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On the other hand, Congress was trying to unite its MLAs and take them out, whereas BJP played the game.
बीजेपी के जााल में उलझाया, कांग्रेस फंस गई! मध्य प्रदेश में कांग्रेस एक बार फिर अपने ही जाल में फंस गई। राज्यसभा के लिए नाम तय करने में इतनी देर हुई कि दिग्विजय सिंह और कमलनाथ के नाम घिसते-घिसते वक्त निकल गया। आखिर में मीनाक्षी नटराजन का नाम फाइनल हुआ, विधायकों को बाड़ेबंदी में भेजा भी गया। पर अगले ही पल नामांकन रद्द की खबर आई और पूरा काफिला उल्टे पैर लौट आया। सबसे बड़ी गलती मीनाक्षी नटराजन की रही.... अपने ऊपर दर्ज प्रकरण छुपा लिया। पर सवाल कांग्रेस के सिस्टम पर है। राजेंद्र भारती और मुकेश मल्होत्रा पहले ही इसी वजह से विधायकी गंवा चुके हैं। फिर भी लीगल सेल, स्क्रीनिंग कमेटी सोती रही। ‘सत्यापन’ से पहले ‘सहमति’ का रोग कांग्रेस को बार-बार ले डूबता है। बीजेपी की रणनीति सीधी थी... कांग्रेस को कांग्रेस से उलझाए रखो बीजेपी ने एक भी बयान नहीं दिया, एक भी पत्ता नहीं खोला। उसने बस 8 तारीख तक कांग्रेस को सोचने दिया। दिग्विजय बनाम कमलनाथ, दिल्ली बनाम भोपाल, नाम बनाम नीयत.... इन्हीं उलझनों में कांग्रेस उलझी रही। और 9 तारीख को जब डेडलाइन आई तो बीजेपी ने बिना लड़े सीट निकाल ली। यानि.... जहाँ कांग्रेस की सोच खत्म होती है, बीजेपी वहीं से अपनी रणनीति शुरू करती है। ऐसा भी कह सकते है.... "वो उलझाते रहे धागे कांग्रेस के घर में, हमने चुपचाप काट दी गाँठ समय की डोर में, नाम ढूंढते रह गए वो शीशे के महल में, हमने ताज रख लिया खाली सिंहासन पर। कुल मिलाकर तस्वीर साफ है.... कांग्रेस ने प्रत्याशी बदला, पर प्रक्रिया नहीं बदली। जब तक ‘फाइल चेक’ से पहले ‘फोटोशूट’ और ‘सत्यापन’ से पहले ‘सहमति’ का खेल चलेगा, तब तक हर डेडलाइन कांग्रेस के लिए डेथलाइन बनती रहेगी। बीजेपी को जीतने की जरूरत ही नहीं पड़ी