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All three charges against Justice Yashwant Varma proven; inquiry committee report tabled in Lok Sabha.
नई दिल्ली। पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को जांच समिति ने साबित माना है। जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच करने वाली समिति की रिपोर्ट बुधवार को लोकसभा में पेश की गई। समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि नई दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास के स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में बिना हिसाब वाली नकदी मिली थी, जिसका कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।
समिति ने यह भी माना कि नकदी मिलने के बाद उससे जुड़े महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में गंभीर चूक हुई। साथ ही, जस्टिस वर्मा की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण को समिति ने “टालमटोल वाला, अधूरा और प्रभावी रूप से भ्रामक” माना।
समिति ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ तीन प्रमुख आरोपों की जांच की थी। इनमें पहला आरोप बिना हिसाब वाली नकदी की मौजूदगी और उसके कब्जे से जुड़ा था। दूसरा आरोप नकदी मिलने के बाद महत्वपूर्ण साक्ष्यों को सुरक्षित रखने में विफलता से संबंधित था। तीसरा आरोप नकदी की मौजूदगी को लेकर भ्रामक स्पष्टीकरण देने का था। समिति ने अपनी रिपोर्ट में तीनों आरोपों को साबित माना है।
पहला आरोप नई दिल्ली के 30 तुगलक क्रिसेंट स्थित सरकारी आवास के स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में बिना हिसाब वाली भारतीय मुद्रा मिलने से संबंधित था। 14-15 मार्च 2025 की रात सरकारी आवास में आग लगने के बाद स्टोर रूम में 500 रुपये के नोटों के बंडल, ढेर और अलग-अलग स्थानों पर जले, आधे जले और गीले नोट देखे जाने की बात सामने आई थी।
दिल्ली अग्निशमन सेवा और पुलिस के कई अधिकारियों ने समिति के सामने नकदी देखे जाने की पुष्टि की। समिति ने कहा कि तस्वीरों और इलेक्ट्रॉनिक सामग्री से भी इन बयानों को समर्थन मिला।हालांकि, नोटों को सुरक्षित नहीं रखा गया और उनकी उचित गिनती या सूची तैयार नहीं की गई। इस वजह से स्टोर रूम में मौजूद नकदी की सटीक राशि निर्धारित नहीं की जा सकी।
जस्टिस वर्मा की ओर से लगातार यह दलील दी गई कि स्टोर रूम सरकारी आवास से अलग था और उनका उस पर कोई पहुंच या नियंत्रण नहीं था। जांच समिति ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। समिति के अनुसार, सरकारी आवास के परिसर में इतनी बड़ी मात्रा में नकदी का मिलना यह स्थापित करता है कि परिसर पर जस्टिस वर्मा का प्रभावी नियंत्रण था।
हालांकि, समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि रिपोर्ट का अर्थ यह नहीं है कि आपराधिक अर्थ में नकदी का प्रत्यक्ष व्यक्तिगत स्वामित्व जस्टिस वर्मा का साबित हो गया है।
समिति के अनुसार, स्थापित तथ्य यह है कि जज के कब्जे वाले सरकारी परिसर में बड़ी मात्रा में बिना स्पष्टीकरण वाली नकदी मिली और जस्टिस वर्मा उसके स्रोत, मौजूदगी या स्वामित्व के संबंध में संतोषजनक जवाब देने में विफल रहे।
दूसरे आरोप के तहत समिति ने नकदी मिलने के बाद साक्ष्यों को सुरक्षित नहीं रखने के मामले की जांच की। रिपोर्ट में कहा गया कि परिसर को सील करने और निरीक्षण से पहले नकदी तथा स्टोर रूम की स्थिति को ठीक तरीके से सुरक्षित नहीं रखा गया। नोटों को जब्त नहीं किया गया, उनकी सूची नहीं बनाई गई और उचित पंचनामा भी तैयार नहीं किया गया। स्टोर रूम को तत्काल सील भी नहीं किया गया।
समिति ने जली हुई नकदी को सुरक्षित नहीं रखने को पुलिस की ओर से चूक माना। हालांकि, समिति ने कहा कि इस चूक से उन अधिकारियों के बयानों का महत्व खत्म नहीं होता, जिन्होंने मौके पर नकदी देखी थी।
समिति ने घटना के बाद जस्टिस वर्मा के घरेलू कर्मचारियों के संपर्क में रहने से जुड़े साक्ष्यों को भी महत्वपूर्ण माना। रिपोर्ट में उनके निजी सचिव राजिंदर सिंह कार्की और घरेलू कर्मचारी मोहम्मद राहिल का उल्लेख किया गया है। एक गवाह सी.जी. रावत ने समिति को बताया कि आग बुझने के बाद उसने कार्की और राहिल को स्टोर रूम के पास सफाई करते देखा था। हालांकि, समिति ने यह नहीं कहा कि जस्टिस वर्मा ने स्वयं नकदी हटाई थी।
समिति ने कहा कि महत्वपूर्ण बात यह थी कि घटना की जानकारी होने के बाद जस्टिस वर्मा ने परिसर में मौजूद साक्ष्यों को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक कदम नहीं उठाए।
जस्टिस वर्मा की ओर से यह तर्क दिया गया कि साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी पुलिस और अग्निशमन अधिकारियों की थी। समिति ने इस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया। रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों की अपनी चूक के बावजूद जस्टिस वर्मा को यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाने चाहिए थे कि नकदी सुरक्षित रहे, उसकी सूची तैयार हो और घटना की जानकारी उचित अधिकारियों को दी जाए। इसी आधार पर समिति ने दूसरा आरोप भी साबित माना।
तीसरे आरोप की जांच के दौरान समिति ने जस्टिस वर्मा के बयानों और उनके बचाव का भी परीक्षण किया। समिति के मुताबिक, शुरुआत में जस्टिस वर्मा ने बिना हिसाब वाली नकदी से जुड़े सभी आरोपों को पूरी तरह खारिज किया। बाद में उनकी दलील का केंद्र नकदी जब्त नहीं किए जाने, नोटों के वहां रखे जाने की संभावना और किसी बड़ी साजिश की आशंका पर चला गया। समिति ने कहा कि इन दावों के समर्थन में कोई ठोस साक्ष्य पेश नहीं किया गया। बचाव पक्ष की ओर से गवाहों की सूची भी प्रस्तुत नहीं की गई।
रिपोर्ट में कहा गया कि प्रस्तुतिकरण पक्ष की गवाही पूरी होने और गवाहों से जिरह के बाद जस्टिस वर्मा ने कार्यवाही में हिस्सा लेना बंद कर दिया। समिति ने स्पष्ट किया कि कार्यवाही से उनका हटना अपने आप में आरोप साबित करने वाला तथ्य नहीं है। हालांकि, उनके द्वारा लगाए गए आरोपों के समर्थन में साक्ष्य पेश नहीं किए जाने के संदर्भ में इसे महत्वपूर्ण माना गया। समिति के अनुसार, जस्टिस वर्मा का स्पष्टीकरण स्वतंत्र अधिकारियों द्वारा देखी गई बड़ी मात्रा में नकदी की मौजूदगी का पर्याप्त उत्तर नहीं था।
समिति ने कहा कि जस्टिस वर्मा ने कथित जांच, घटनास्थल को सुरक्षित रखने के लिए उठाए गए कदमों या किसी बाहरी साजिश के आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री पेश नहीं की। इसी आधार पर समिति ने तीसरे आरोप को भी साबित माना।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को जजेज इन्क्वायरी एक्ट, 1968 के तहत जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए समिति गठित की थी। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार ने की। समिति में तत्कालीन बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर, जो बाद में सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत हुए, और वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य शामिल थे। समिति ने 18 मई 2026 को अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी। अब बुधवार को रिपोर्ट लोकसभा में पेश की गई।
पूरा मामला मार्च 2025 में नई दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास में आग लगने के बाद सामने आया था। आग बुझाने के दौरान स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में कथित तौर पर बिना हिसाब वाली नकदी मिलने की बात सामने आई थी। जस्टिस वर्मा ने आरोपों से इनकार किया था और 10 अप्रैल 2025 को जज के पद से इस्तीफा दे दिया था। समिति ने जांच में सहयोग करने वाले अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी और राजा ठाकरे, वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा और सिद्धार्थ अग्रवाल तथा अधिवक्ताओं करण उमेश सालवी और समीक्षा दुआ के योगदान की भी सराहना की है।