

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

BJP signals it will contest Punjab elections alone.
नई दिल्ली। पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। भाजपा की ओर से राज्य में अकेले चुनाव लड़ने की बात सामने आने के बाद शिरोमणि अकाली दल के साथ संभावित गठबंधन को लेकर भी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। राजनीतिक गलियारों में माना जा रहा है कि चुनावी समीकरणों को देखते हुए दोनों दल एक बार फिर साथ आने की संभावनाओं पर विचार कर सकते हैं भाजपा प्रदेश की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपनी संगठनात्मक ताकत बढ़ाने की तैयारी में जुटी है। पार्टी नेताओं के बयानों से संकेत मिल रहे हैं कि इस बार भाजपा पहले की तुलना में अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की रणनीति बना रही है। दूसरी ओर अकाली दल भी अपने पुराने राजनीतिक आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।
सीट बंटवारा बन सकता है सबसे बड़ी चुनौती
भाजपा और अकाली दल के बीच यदि गठबंधन की बात आगे बढ़ती है तो सबसे कठिन मुद्दा सीटों का बंटवारा रहेगा। दोनों दलों की अपनी अपनी राजनीतिक दावेदारी है और यही कारण है कि सीटों को लेकर सहमति बनाना आसान नहीं माना जा रहा।पूर्व में दोनों दल लंबे समय तक गठबंधन में रहे हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में दोनों ने मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन 2020 में कृषि कानूनों को लेकर दोनों दलों के बीच मतभेद बढ़ गए और गठबंधन टूट गया। इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव तथा 2024 के लोकसभा चुनाव में दोनों पार्टियों ने अलग अलग चुनाव लड़ा।
अलग चुनाव लड़ने से दोनों को नुकसान की चिंता
राजनीतिक जानकारों के अनुसार पंजाब में त्रिकोणीय या बहुकोणीय मुकाबले की स्थिति में वोटों का बंटवारा किसी भी दल के लिए नुकसानदेह हो सकता है। भाजपा और अकाली दल यदि अलग अलग चुनाव मैदान में उतरते हैं तो दोनों के पारंपरिक वोट बैंक पर असर पड़ने की संभावना है अकाली दल लंबे समय से पंजाब की राजनीति में प्रमुख क्षेत्रीय शक्ति रहा है, जबकि भाजपा शहरी क्षेत्रों में अपने प्रभाव को बढ़ाने का प्रयास कर रही है। ऐसे में दोनों दलों के बीच संभावित तालमेल चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है।
भाजपा का बढ़ा वोट प्रतिशत भी अहम
पिछले चुनावों के आंकड़े भाजपा की बदली हुई स्थिति की ओर इशारा करते हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत पहले की तुलना में बढ़ा था। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी ने अलग चुनाव लड़कर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।भाजपा का जोर अब पंजाब में संगठन विस्तार और अपने आधार को मजबूत करने पर है। पार्टी के भीतर एक वर्ग अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने की पैरवी कर रहा है। हालांकि गठबंधन की स्थिति बनने पर सीटों के बंटवारे को लेकर रणनीति में बदलाव संभव है।
अकाली दल भी गठबंधन के विकल्प पर नजर रखे हुए
अकाली दल की ओर से भी भाजपा के साथ पुराने संबंधों को पूरी तरह नकारने के बजाय राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार विकल्प खुले रखने के संकेत मिलते रहे हैं। पार्टी के लिए ग्रामीण पंजाब में अपना आधार मजबूत रखना महत्वपूर्ण है, जबकि भाजपा के साथ संभावित तालमेल उसे अतिरिक्त राजनीतिक लाभ दे सकता है।फिलहाल दोनों दलों के बीच गठबंधन को लेकर कोई अंतिम फैसला सामने नहीं आया है। लेकिन भाजपा के अकेले चुनाव लड़ने के संकेत और अकाली दल के साथ संभावित बातचीत ने पंजाब की चुनावी राजनीति को अभी से गर्म कर दिया है।
2027 के चुनाव में क्या बदल सकता है समीकरण
पंजाब में इस समय आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, भाजपा और अकाली दल जैसे प्रमुख राजनीतिक दल अपने अपने स्तर पर जमीन मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में भाजपा और अकाली दल के बीच गठबंधन होता है या दोनों अलग अलग मैदान में उतरते हैं, यह फैसला चुनावी मुकाबले की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है।