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CG: Amidst questions on wildlife protection law, preparations for social boycott of offenders, and weak action in poaching cases, new Forest Department directives have raised constitutional debate.
रायपुर। छत्तीसगढ़ में लगातार बढ़ती अवैध शिकार की घटनाओं के बीच वन विभाग की कार्यप्रणाली एक बार फिर विवादों में घिर गई है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम के तहत प्रभावी दंड सुनिश्चित करने में कथित विफलता, कमजोर विवेचना और दोषपूर्ण केस तैयारी के चलते अभियुक्तों को शीघ्र जमानत मिलने जैसी स्थितियों के बीच अब विभाग ने एक नया रास्ता अपनाया है। आरोप है कि वन विभाग अब अपराधियों का सामाजिक स्तर पर बहिष्कार कराने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है, जिसे कई सामाजिक और कानूनी विशेषज्ञ अवैधानिक और असंवैधानिक बता रहे हैं।
बैठक में जारी हुए निर्देश
24 दिसंबर 2025 को आयोजित मासिक समीक्षा बैठक में प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्य प्राणी) की अध्यक्षता में यह निर्देश जारी किए गए। बैठक में 15 आईएफएस और 4 राज्य वन सेवा अधिकारियों की मौजूदगी में कहा गया कि वन और संरक्षित क्षेत्रों में फंदा लगाकर हो रहे बड़े पैमाने पर अवैध शिकार की घटनाओं को रोकने के लिए गांव स्तर पर सामाजिक दबाव बनाया जाए।

निर्देशों के अनुसार संबंधित गांवों के मुखिया, धर्मगुरु, प्रतिष्ठित व्यक्तियों और समाजसेवी संस्थाओं के साथ बैठकें आयोजित की जाएंगी। इन बैठकों में अवैध शिकार की तस्वीरें प्रदर्शित कर ग्रामीणों से अपराधियों के सामाजिक बहिष्कार की अपील की जाएगी। इसकी शुरुआत कवर्धा वनमंडल और उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व क्षेत्र से किए जाने की योजना बनाई गई है। इसके साथ ही अधिकारियों को अपने क्षेत्रों में अपराधियों और संदिग्धों की सूची तैयार करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
क्या होता है सामाजिक बहिष्कार?
सामाजिक बहिष्कार का अर्थ किसी व्यक्ति या परिवार को सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों से अलग-थलग कर देना होता है। इसमें सामुदायिक संबंध तोड़ना, सार्वजनिक अपमान, सामाजिक कार्यक्रमों में भागीदारी पर रोक, लेन-देन बंद करना और सामाजिक दबाव के जरिए दंडात्मक स्थिति बनाना शामिल है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में इसका प्रभाव अत्यंत गंभीर हो सकता है, जिससे व्यक्ति की आजीविका, सम्मान और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर पड़ता है।

मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को शिकायत पत्र
इस पूरे मामले को लेकर रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को पत्र लिखकर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्रदत्त समानता, स्वतंत्रता और गरिमापूर्ण जीवन के अधिकारों का उल्लंघन है। साथ ही यह सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित ‘रूल ऑफ लॉ’ के सिद्धांत के भी विपरीत है।
सिंघवी ने पत्र में स्पष्ट किया कि किसी भी अपराध में दंड तय करने का अधिकार केवल न्यायालय को है। ग्राम समाज, धर्मगुरु या सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से सार्वजनिक अपमान और दबाव बनाना गैर-कानूनी, अनैतिक और असंवैधानिक है।
शासन की नीति से भी टकराव का आरोप
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया है कि छत्तीसगढ़ शासन स्वयं सामाजिक बहिष्करण जैसी कुप्रथाओं का विरोध करता रहा है। ऐसे में एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा इस तरह की कार्यप्रणाली को बढ़ावा देना न केवल चिंताजनक है, बल्कि इससे समाज में भय, वैमनस्य और विभाजन की स्थिति पैदा हो सकती है।
कोर्ट से बरी होने पर जिम्मेदारी किसकी?
नितिन सिंघवी ने यह सवाल भी उठाया है कि यदि किसी व्यक्ति को पहले ही सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा और बाद में अदालत से वह दोषमुक्त हो गया, तो उस मानसिक प्रताड़ना और सामाजिक नुकसान की भरपाई कौन करेगा? उन्होंने इसे न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक मर्यादा के लिए गंभीर चुनौती बताया है।
उठ रहे हैं कई सवाल
वन विभाग की इस पहल ने अब प्रदेश में एक नई बहस छेड़ दी है। एक ओर जहां अवैध शिकार रोकने की चुनौती है, वहीं दूसरी ओर कानून के दायरे से बाहर जाकर सामाजिक दंड लागू करने की कोशिश को लेकर संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अब देखना होगा कि शासन इस विवाद पर क्या रुख अपनाता है और क्या इन निर्देशों पर पुनर्विचार किया जाएगा।