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CSVTU PhD fee scam: FIR ordered against former officials and consultant
CSVTU PhD fee scam: भिलाई स्थित छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनीकी विश्वविद्यालय (सीएसवीटीयू) में सामने आए पीएचडी फीस घोटाले की अब पुलिस जांच होगी। विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने गुरुवार को हुई बैठक में यह बड़ा निर्णय लिया कि पीएचडी शाखा के तत्कालीन प्रभारी, उस समय पदस्थ अन्य संबंधित अधिकारियों और पूरे प्रकरण में शामिल कंसलटेंट के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी। साथ ही आरोपी कंसलटेंट की सेवाएं समाप्त करने का भी फैसला लिया गया है।
यह घोटाला तब सामने आया जब पीएचडी फीस से जुड़े रिकॉर्ड का नियमित मिलान किया गया। जांच के दौरान फीस रजिस्टर और बैंक खातों में बड़ा अंतर पाया गया, जिसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने आंतरिक जांच शुरू की। शोधार्थियों से पूछताछ और दस्तावेजों की गहन जांच में यह मामला एक संगठित वित्तीय अनियमितता के रूप में उजागर हुआ।
जांच रिपोर्ट में संकेत मिले हैं कि विश्वविद्यालय के कुछ पूर्व अधिकारी भी इस घोटाले में संलिप्त रहे हैं। कार्यपरिषद ने स्पष्ट किया है कि उस समय कार्यरत सभी संबंधित अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई है, इसलिए सभी के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाएगी। मामले के सामने आने के बाद से लगातार पीएचडी शोधार्थी विश्वविद्यालय पहुंचकर अपनी शिकायतें दर्ज करा रहे हैं, जिससे पीएचडी शाखा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
कार्यपरिषद के समक्ष प्रस्तुत जांच समिति की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि पीएचडी शोधार्थियों से फर्जी रसीदों के माध्यम से योजनाबद्ध तरीके से फीस वसूली की गई। प्रारंभिक जांच में करीब 10 लाख रुपये की वित्तीय अनियमितता सामने आई है, जबकि आशंका जताई जा रही है कि यह राशि आगे चलकर 50 से 60 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। जांच में 60 से 80 पीएचडी शोधार्थियों की फीस से जुड़े रिकॉर्ड संदिग्ध पाए गए हैं।
जांच में यह भी सामने आया कि यह पूरा नेटवर्क एक संगठित सिंडिकेट की तरह काम कर रहा था। जब शोधार्थियों से दोबारा फीस मांगी गई और उन्होंने विरोध किया, तब मामला और गंभीर हो गया। कुलपति के निर्देश पर शासकीय इंजीनियरिंग कॉलेजों के वरिष्ठ अधिकारियों की जांच समिति गठित की गई, जिसने पूरे घोटाले की परतें उजागर कीं।
जांच समिति के अनुसार, फीस कभी क्यूआर कोड, कभी नकद और कभी अन्य माध्यमों से ली गई, लेकिन यह राशि विश्वविद्यालय के आधिकारिक खाते में जमा नहीं की गई। इसके बजाय पैसा निजी खातों में डायवर्ट किया गया। कई मामलों में शोधार्थियों को दी गई रसीदें फर्जी पाई गईं, जिनमें पुरानी रसीद पुस्तकों के सीरियल नंबर का इस्तेमाल किया गया था, ताकि लेखा परीक्षण में गड़बड़ी सामने न आए।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्रारंभिक तौर पर लगभग 10 लाख रुपये की रिकवरी के लिए कार्रवाई की अनुशंसा की है। इसके साथ ही कंसलटेंट और अन्य आरोपियों के खिलाफ पुलिस जांच कराकर दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई करने का निर्णय लिया गया है।
इस पूरे पीएचडी फीस घोटाले का सबसे पहले खुलासा पत्रिका ने किया था। पत्रिका की रिपोर्ट में पूर्व अधिकारियों और कंसलटेंट की मिलीभगत से फर्जी रसीदों के जरिए की जा रही वसूली को उजागर किया गया था। खबर प्रकाशित होने के बाद ही जांच शुरू हुई और अब मामला एफआईआर तक पहुंच गया है।