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Chhattisgarh: Significant order by Bilaspur High Court; grandparents, along with the father, will also be able to meet the child.
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद से जुड़े मामले में बच्चे के कल्याण को प्राथमिकता देते हुए महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। कोर्ट ने अपने पूर्व अंतरिम आदेश में संशोधन करते हुए पिता के साथ-साथ बच्चे के दादा-दादी को भी उससे मिलने की अनुमति प्रदान की है। साथ ही बच्चे के नाम पर भरण-पोषण राशि जमा करने के संबंध में भी निर्देश दिए हैं।
यह आदेश जस्टिस संजय एस. अग्रवाल और जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की डिवीजन बेंच ने रितेश बोहरा बनाम पूर्वी जैन बोहरा मामले की सुनवाई के दौरान पारित किया। अपीलकर्ता रितेश बोहरा ने 10 अप्रैल 2026 को जारी अंतरिम आदेश में संशोधन की मांग करते हुए आवेदन दायर किया था।
पिता की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पत्नी पूर्वी जैन बोहरा बच्चे से मिलने में बाधा उत्पन्न कर रही हैं। उनका कहना था कि जब रितेश बोहरा अपने माता-पिता के साथ बच्चे से मिलने पहुंचे तो पत्नी के परिवार ने दादा-दादी को बच्चे से मिलने की अनुमति नहीं दी।
वहीं, पत्नी की ओर से प्रस्तुत पक्ष ने इन आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि कभी भी पिता को बच्चे से मिलने से नहीं रोका गया।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने कहा कि किसी भी पारिवारिक विवाद में बच्चे का मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास सर्वोच्च महत्व रखता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे के समग्र विकास के लिए परिवार के अन्य सदस्यों, विशेषकर दादा-दादी के साथ उसका संपर्क भी आवश्यक है।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि पिता को प्रत्येक शनिवार और रविवार बच्चे से मिलने का अधिकार होगा। इसके अलावा दादा-दादी को भी बच्चे से मिलने की अनुमति दी गई है। अदालत ने यह भी कहा कि मुलाकात के दौरान किसी भी पक्ष द्वारा अनावश्यक हस्तक्षेप या परेशानी नहीं की जाएगी।
हाई कोर्ट ने बच्चे के भविष्य को ध्यान में रखते हुए निर्देश दिया कि भरण-पोषण की राशि बच्चे के नाम पर जमा की जाएगी। इस खाते में बच्चे के माता-पिता दोनों संयुक्त हस्ताक्षरकर्ता होंगे, ताकि राशि का उपयोग केवल बच्चे के हित में सुनिश्चित किया जा सके।
अदालत के इस आदेश को पारिवारिक विवादों में बच्चों के अधिकारों और उनके सर्वांगीण विकास को प्राथमिकता देने वाला महत्वपूर्ण फैसला माना जा रहा है। कोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया कि माता-पिता के बीच मतभेदों का असर बच्चे के रिश्तों और उसके भावनात्मक विकास पर नहीं पड़ना चाहिए।