

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

Crime under the guise of protest is unacceptable: Bombay High Court’s stern remark during a hearing on a plea seeking a stay on police action.
मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और पुलिस की कार्रवाई से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है, लेकिन प्रदर्शन के नाम पर कानून का उल्लंघन करने या अपराध करने की छूट नहीं दी जा सकती। पुलिस कार्रवाई पर रोक लगाने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि पुलिस की सख्ती पर रोक लगाने से पहले प्रदर्शनकारियों की पृष्ठभूमि और आम लोगों को होने वाली असुविधा जैसे पहलुओं पर भी विचार किया जाना चाहिए।
रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश महेश चंद्र त्रिपाठी और न्यायमूर्ति अहतेश सेठना की पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। याचिका में दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए थे। आरोप लगाया गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ शाह और हालिया प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने कुछ लोगों को अवैध रूप से हिरासत में लिया था।
सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि हर व्यक्ति को अपनी बात रखने और आंदोलन करने का अधिकार है। हालांकि, आंदोलन शांतिपूर्ण होना चाहिए। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी प्रदर्शन में शामिल होने वाले व्यक्तियों की पृष्ठभूमि भी देखी जानी चाहिए।
पीठ ने टिप्पणी की कि पुलिस की सख्ती पर रोक लगाने के लिए व्यापक आदेश जारी करने से पहले यह देखना आवश्यक है कि प्रदर्शन में शामिल लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड तो नहीं है। साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि ऐसे प्रदर्शनों से आम नागरिकों को किस तरह की परेशानी होती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि निर्दोष नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना भी जरूरी है। प्रदर्शन के कारण आम लोगों की आवाजाही प्रभावित होती है या उन्हें किसी तरह की असुविधा होती है, तो उस पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
रिपोर्ट के अनुसार, याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में यह मांग की गई थी कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में शामिल होने वाले लोगों को पुलिस द्वारा हिरासत में लेने पर रोक लगाने के निर्देश दिए जाएं।
याचिका में आरोप लगाया गया कि दिल्ली में हुए प्रदर्शनों के दौरान पुलिस ने कुछ लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की और उन्हें हिरासत में लिया। याचिकाकर्ताओं ने इस कार्रवाई को लेकर अदालत से हस्तक्षेप की मांग की।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि इस तरह के मामलों में सभी पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है। केवल प्रदर्शन में शामिल होने के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ अनुचित व्यवहार नहीं होना चाहिए, लेकिन प्रदर्शन के नाम पर कानून तोड़ने की अनुमति भी नहीं दी जा सकती।
इस मामले में अदालत की टिप्पणी का मुख्य संदेश यह है कि लोकतंत्र में विरोध और प्रदर्शन की अहम भूमिका है। नागरिकों को सरकार या किसी सार्वजनिक प्राधिकरण के फैसलों के खिलाफ अपनी असहमति व्यक्त करने का अधिकार है। लेकिन इस अधिकार का इस्तेमाल कानून के दायरे में रहकर किया जाना चाहिए।
वहीं, पुलिस की जिम्मेदारी भी है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखते हुए नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सम्मान करे। किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन में शामिल व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करते समय परिस्थितियों और उसकी भूमिका को ध्यान में रखना जरूरी है।
अदालत की टिप्पणी से यह स्पष्ट होता है कि प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है। हालांकि, उपलब्ध अखबारी रिपोर्ट के आधार पर इसे सभी तरह के प्रदर्शनों में गिरफ्तारी पर रोक लगाने या पुलिस को असीमित अधिकार देने वाला अंतिम आदेश नहीं माना जाना चाहिए।