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If all the leaders return the cut money, then it will not take long to become a 'bird of gold' - Chaitanya Bhatt
आजकल धर पकड़ का दौर चल रहा है ईडी, एसीबी, लोकायुक्त, इन्कम टैक्स सारे विभागों ने जैसे भ्रष्टाचार के ख़िलाफ मुहिम छेड़ दी है। नौकरीशुदा लोगों को तो रंगे हाथों पकड़ा ही जा रहा है, रिटायर्ड अधिकारियों को भी नहीं बख्शा जा रहा जिनसे करोड़ों की काली कमाई जप्त हो रही है। लोग हैरान हैं कि देश भर में सालों से व्याप्त भ्रष्टाचार पर अचानक सिस्टम इस कदर क्यों टूट पड़ा है! ये सबको मालूम है कि बिना "कट मनी" के तो सरकारी अमला टस से मस नहीं होता। नौकरी चाकरी हो, ट्रांसफर हो, प्रमोशन हो, ठेका हो, लायसेंस हो या लोन हो नीचे से ऊपर तक बाकायदा चेन सिस्टम बना हुआ है। ऊपर बैठा नेता कहता है कि फाइल नीचे से चलवाओ फिर बात करेंगे। नीचे तैनात अफसर कहता है कि बिना चढ़ावे के काम होगा ही नहीं क्योंकि पैसा ऊपर तक पहुंचाना पड़ता है। और कट मनी देते ही फाइल इतनी तेज दौड़ने लगती है कि उसकी स्पीड देखकर रेस के घोड़े भी आश्चर्यचकित हो जाते हैं द
आजादी के बाद से अब तक इतनी सरकारी योजनाएं लागू की जा चुकी हैं कि खर्च के हिसाब से भारत को अब तक विकसित देश हो जाना चाहिये था लेकिन अफसोस कि हम अब तक गरीबी, बेरोजगारी, भूख और अभाव पूरी तरह खत्म नहीं कर पाये। कहा जाता है कि आदिवासी विकास हेतु सरकारी खजाने से इतना पैसा खर्च किया जा चुका है कि अगर सीधा आदिवासियों को नकद सौंप दिया जाता तो हर आदिवासी करोड़पति हो जाता। दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने तो सरेआम स्वीकार किया था कि ऊपर से जो एक रुपया चलता है वो नीचे असल लाभार्थी तक आते आते 15 पैसे हो जाता है। ये बीच का 85 पैसा ही कट मनी है जो देश में रस्मोरिवाज और आदत की तरह बिचौलियों में बाँट लिया जाता है। इसमें नेता, अफसर, दलाल और छुटभैये सब शामिल हैं।
मगर इस पकड़ा धकड़ी और अफरा तफरी के दौर में एक बड़ी राहत भरी खबर भी है कि बंगाल में पिछला चुनाव हारने के बाद "तृण मूल कांग्रेस" यानी टीएमसी के नेता लोगों को बुला बुला कर कट मनी वापस कर रहे हैं। दरअसल बंगाल में भी ममता दीदी ने बढ़िया इंतजाम करके रखा था वो अफसरों पर ज्यादा भरोसा नहीं करती थीं। इसलिये जिसे भी सरकारी योजनाओं का फायदा लेना हो वो लोकल नेताओं को चढ़ावा पहुंचाता था ताकि नेता फायदे की फाइल को सरकारी दफ्तर में आगे सरका सके। किसी को सस्ता मकान चाहिये, किसी को लाइसेंस चाहिये, किसी को नौकरी या किसी योजना का कोई बेनीफिट, कट मनी देकर काम करवाने का बढ़िया सिस्टम बना हुआ था। लेकिन बदकिस्मती से टीएमसी चुनाव हार गयी। जब सरकार ही नहीं रही तो फिर फाइल और फायदा दोनों गायब। बहरहाल टीएमसी नेता कट मनी वापस कर रहे हैं।
इस पूरे ड्रामे पर लोगों की अलग अलग राय है। कोई कह रहा है कि ये कट मनी वाला सिस्टम तो पूरे देश में चल रहा है। किसी का कहना है कि सिर्फ नेता क्यों सरकारी अफसरों को भी कट मनी वापस करने की मुहिम चलाना चाहिये। कुछ लोग अफवाह उड़ा रहे हैं कि कट मनी में से भी कई नेता थोड़ा सा कट लेकर ही पैसा वापस कर रहे हैं। इसी चक्कर में जनता ने कहीं कहीं पर नेताओं को पीट पाट भी दिया है। पता नहीं ये सत्तारूढ़ सरकार से डर है या फिर रातों रात टीएमसी नेताओं का ज़मीर जाग गया है। बचपन से सुनते आये हैं कि अपनी समृद्धि और खुशहाली के कारण भारत किसी जमाने में दुनिया भर में "सोने की चिड़िया" कहलाता था। अगर देश के सारे नेता इसी तरह जनता से वसूला गया कट मनी वापस कर दें तो भारत को फिर से "सोने की चिड़िया" बनने में देर नहीं लगेगी।
'इलाहाबाद हाईकोर्ट" ने एक मामले में टिप्पणी करते हुए कहा कि राज्य के पुलिस अफसरों की वफादारी संविधान के प्रति नहीं बल्कि सत्ताधारी दल के प्रति है फील्ड के अवसर, ट्रांसफर, पोस्टिंग,और इकोनॉमी को ध्यान में रखते हुए वे अपना आचरण तय करते हैं और राजनीतिक नेतृत्व को खुश करने के लिए काम करते हैं बात तो सौ फीसदी सही कही है हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति ने लेकिन बेचारे अफसर करें भी तो क्या करें? इतनी पढ़ाई लिखाई करके, पैसा खर्च करके अफसर बनते हैं और यदि सत्ताधारी दल के नेताओं को खुश ना रखें तो लूप लाइन में पड़े पड़े जिंदगी बिताएं ये तो कोई नहीं चाहता हर कोई लूप लाइन में पड़े रहने के लिए तो आता नहीं सबको फील्ड चाहिए और फील्ड में ही सारा खेल होता है यदि अफसर को फील्ड चाहिए तो फील्ड देने वाला कौन है सत्ताधारी दल का नेता, तो उसको प्रसन्न करना तो जरूरी है संविधान की कसम तो नेता भी खाते हैं लेकिन क्या संविधान के अनुरूप काम होता है और फिर तो आजकल ये चलन चल रहा है ज्यादा नियम कानून की तो देर नहीं लगती लूप लाइन में जाते हुए जो सत्ताधारी दल का नेता कहता है वही अफसर करता है पर इन अफसरों का क्या,जो भी सत्ता में रहेगा हम तो उसी के हिसाब से चलेंगे ये उनका नारा होता है आज इनकी सरकार है, कल उनकी आएगी आज हम इनके पीछे हैं कल उनके पीछे चले जाएंगे। नेताओं का क्या है पांच साल रहेंगे हमें तो पैंतीस साल नौकरी करना है अब यदि सत्तादारी दल के नेताओं को पटाकर नहीं रखेंगे तो पैंतीस साल ऐसे ही थोड़ी बेकार कर देंगे यह सोच भी उनको सत्ताधारी दल के प्रति के नेताओं को खुश रखने के लिए होती है। बहरहाल हाई कोर्ट ने जो भी टिप्पणी की हो अपने को लगता है कि इससे अफसरों को कोई बहुत ज्यादा फर्क पड़ने वाला नहीं है वे जैसा काम करते आए हैं वैसा ही करते रहेंगे।
मशहूर गजल गायक स्वर्गीय जगदीश सिंह की एक ग़ज़ल का शेर है "वो जो अपने हैं क्या वो अपने हैं, कौन दुख झेले आजमाये कौन"यानी जो अपने हैं उनको आजमाने की गलती कभी ना करना वरना दुख ही दुख आपके हिस्से में आएगा । हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अजय सिंह ने भी कुछ इसी तर्ज पर कांग्रेसियों की बैठक में कहा कि हम चुनाव लड़ते हैं और अपनों के ही कारण हार जाते हैं जब जब चुनाव आते हैं हर आदमी दावेदार बन जाता है एक दूसरे की टांग खींचने के लिए तैयार हो जाते हैं और अगर ऐसा ही होता रहा तो पीछे की लाइन दिखाई नहीं देगी, बड़ी गहरी बात कर दी है राहुल भैया ने ,लेकिन कांग्रेस में तो ये कोरोना से भी ज्यादा भयानक बीमारी है गुटबाजी, अनुशासनहीनता, मनमर्जी के बयान, ये तमाम बातें कांग्रेस नेताओं के लोगों में घर कर गई है अब देखो ना "मीनाक्षी नटराजन" को राज्यसभा का उम्मीदवार क्या बनाया उनके विरोध में उन्हीं की पार्टी के लोगों ने बिगुल बजा दिया वहीं भाजपा को देखो मध्य प्रदेश के बाहर के व्यक्ति को राज्यसभा भेजा जा रहा है लेकिन किसी ने उफ़ तक नहीं की राहुल भैया की बात मानो ना मानो कांग्रेसियों कम से कम बीजेपी से इसी बात की शिक्षा ले लो ,और फिर दूसरा चक्कर तो ये भी है कि हाईकमान के हाथ से सारी चीजें फिसलती जा जा रही है कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदला तो मंत्रियों ने इस्तीफा देना शुरू कर दिया। राहुल भैया ने जो कुछ कहा है वो बहुत बड़ी सच्चाई है और अगर अभी भी कांग्रेसियों ने उनकी बात पर अमल नहीं किया तो फिर इनका भगवान ही मालिक है।
"कल एक भिखारी आया था वो बड़ा ही बदतमीज निकला "श्रीमती जी ने श्रीमान जी से कहा
“ऐसी क्या बदतमीजी कर दी उसने”
"कल मैने उसे खाना दिया था आज वो मुझे एक किताब दे गया "अच्छा खाना कैसे बनाए" श्रीमती जी ने उत्तर दिया