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Major High Court ruling: Petition regarding LB teachers' promotion dismissed; relief against 2017 circular denied.
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने राज्य के विभिन्न स्कूलों में कार्यरत एलबी संवर्ग के शिक्षकों को बड़ा झटका देते हुए उनकी पदोन्नति से जुड़ी याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि 10 मार्च 2017 के सर्कुलर के आधार पर मांगे गए सेवा संबंधी लाभ और पदोन्नति का दावा नियमों के अनुरूप नहीं है। डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार के पक्ष को सही ठहराते हुए अपील को निरस्त कर दिया।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर सके कि उनका मामला पहले दिए गए सोनिका साहू बनाम छत्तीसगढ़ शासन के फैसले जैसी परिस्थितियों से मेल खाता है। अदालत ने माना कि 10 मार्च 2017 के सर्कुलर की गलत व्याख्या कर पदोन्नति का दावा किया गया, जो कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।
धमतरी जिले के शिक्षक भागबली बंदे, विष्णु प्रसाद सिन्हा और नोमेश कुमार साहू ने सेवा संबंधी लाभ और पदोन्नति की मांग को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इससे पहले 24 नवंबर 2025 को एकल पीठ उनकी याचिका खारिज कर चुकी थी, जिसके खिलाफ उन्होंने डिवीजन बेंच में अपील की थी।सुनवाई के दौरान अदालत ने पुमलता मानिकपुरी बनाम छत्तीसगढ़ शासन मामले का भी उल्लेख किया, जिसमें इसी तरह के दावे को पहले ही खारिज किया जा चुका है। इसी आधार पर कोर्ट ने वर्तमान अपील भी निरस्त कर दी।
इसी दिन हाई कोर्ट ने जेल विभाग में डीआईजी पद पर पदोन्नति से जुड़े मामले में भी महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि पदोन्नति केवल वरिष्ठता के आधार पर नहीं दी जा सकती। मेरिट-सह-वरिष्ठता के सिद्धांत का पालन करना अनिवार्य है।कोर्ट ने कहा कि यदि सभी उम्मीदवारों को बिना तुलनात्मक मूल्यांकन के समान ग्रेडिंग देकर सिर्फ वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति दी जाती है, तो यह नियमों के विपरीत है। अदालत ने स्पष्ट किया कि कर्मचारी की योग्यता और सेवा रिकॉर्ड का निष्पक्ष मूल्यांकन पदोन्नति का प्रमुख आधार होना चाहिए।
हाई कोर्ट ने राज्य में खुले बिजली तारों और अवैध विद्युत फेंसिंग से हो रही मौतों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जनहित याचिका दर्ज की है। अदालत ने ऊर्जा विभाग के सचिव और सीएसपीडीसीएल के प्रबंध संचालक से व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल कर यह बताने को कहा है कि ऐसी घटनाओं की रोकथाम के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं। मामले की अगली सुनवाई 23 जुलाई 2026 को होगी।
एक अन्य मामले में हाई कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को प्राप्त क्षमादान की शक्ति स्वतंत्र संवैधानिक अधिकार है। यदि दया याचिका खारिज हो जाती है तो उस पर दोबारा विचार करने का कोई संवैधानिक प्रावधान नहीं है। हालांकि, परिस्थितियों में बदलाव होने पर संबंधित कैदी भविष्य में नई दया याचिका या समयपूर्व रिहाई के लिए सक्षम प्राधिकारी के समक्ष आवेदन कर सकता है।