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Major Supreme Court order: No more delays in bail and judgments, strict deadlines set for high courts
नई दिल्ली। देश की न्यायिक व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक कदम उठाया है। शीर्ष अदालत ने सभी हाई कोर्टों के लिए जमानत आदेश, रिहाई प्रक्रिया और फैसले सुनाने को लेकर स्पष्ट समयसीमा निर्धारित कर दी है। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपने विशेष अधिकारों का उपयोग करते हुए यह निर्देश जारी किए हैं।
जमानत याचिका पर आदेश उसी दिन सुनाने का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा है कि जमानत याचिकाओं पर आदेश यथासंभव उसी दिन सुनाया जाना चाहिए। यदि किसी कारणवश आदेश सुरक्षित रखा जाता है, तो उसे अगले दिन तक सुनाकर वेबसाइट पर अपलोड करना अनिवार्य होगा।
जमानत मिलते ही जल्द होगी रिहाई
अदालत ने स्पष्ट किया कि जमानत या सजा निलंबन का आदेश जारी होते ही इसकी सूचना तत्काल जेल प्रशासन को भेजी जाए। सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद आरोपी या दोषी व्यक्ति को उसी दिन अथवा अधिकतम अगले दिन तक रिहा किया जाना चाहिए।
तीन महीने के भीतर सुनाना होगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन मामलों में सुनवाई पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रखा जाता है, उनमें सामान्य परिस्थितियों में तीन महीने के भीतर निर्णय सुनाना आवश्यक होगा। व्यक्तिगत स्वतंत्रता, नियमित जमानत और अग्रिम जमानत जैसे मामलों में इससे भी अधिक प्राथमिकता बरती जानी चाहिए।
फैसलों में देरी से न्याय व्यवस्था की साख पर असर
पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ऐसे संवैधानिक संस्थान हैं जहां हजारों लोग न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। फैसलों में अनावश्यक देरी से पक्षकारों को अपूरणीय क्षति होती है और न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास प्रभावित होता है।
15 दिन में अपलोड होगा विस्तृत फैसला
यदि अदालत केवल फैसले का मुख्य हिस्सा सुनाती है तो कारणों सहित पूरा निर्णय 15 दिनों के भीतर वेबसाइट पर अपलोड करना होगा। मुख्य आदेश सुनाए जाने की तारीख को ही फैसले की तारीख माना जाएगा।
24 घंटे में वेबसाइट पर उपलब्ध होगा निर्णय
खुली अदालत में फैसला सुनाए जाने के बाद उसे 24 घंटे के भीतर हाई कोर्ट की वेबसाइट पर उपलब्ध कराना होगा, ताकि पक्षकारों को प्रतिलिपि के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े।
सार्वजनिक होगी सुरक्षित फैसलों की जानकारी
जब किसी मामले में बहस पूरी होने के बाद फैसला सुरक्षित रखा जाएगा, तो उसकी तारीख हाई कोर्ट की वेबसाइट पर प्रदर्शित करनी होगी। इससे यह स्पष्ट रहेगा कि मामला कब से लंबित है।
चार महीने बाद पक्षकार कर सकेंगे शिकायत
यदि कोई फैसला सुरक्षित रखे जाने के चार महीने बाद भी नहीं आता है, तो संबंधित पक्ष हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष मामला उठा सकेगा। ऐसे आवेदन को दो दिनों के भीतर सूचीबद्ध करना होगा।
लंबित मामलों की होगी नियमित निगरानी
सभी हाई कोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों को लंबित सुरक्षित फैसलों की निगरानी के लिए प्रशासनिक व्यवस्था तैयार करनी होगी। साथ ही जमानत के बाद रिहाई संबंधी आदेशों के पालन की रिपोर्ट भी नियमित रूप से देखी जाएगी।
न्यायिक व्यवस्था में बढ़ेगी पारदर्शिता और जवाबदेही
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इन निर्देशों से वर्षों तक सुरक्षित रखे जाने वाले फैसलों की समस्या पर अंकुश लगेगा। जमानत मिलने के बाद रिहाई में होने वाली देरी कम होगी और न्यायिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी, जवाबदेह तथा प्रभावी बनेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया उद्देश्य
अदालत ने स्पष्ट किया कि ये निर्देश किसी विशेष न्यायाधीश या किसी हाई कोर्ट की आलोचना के लिए नहीं हैं। इनका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि न्याय समय पर मिले और न्यायिक प्रक्रिया में जनता का भरोसा और मजबूत हो।