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Private companies will now also have access to DRDO's missile technology; Defence Minister Rajnath Singh has granted approval.
नई दिल्ली। भारत के रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) को उसकी ओर से विकसित पारंपरिक मिसाइल तकनीक भारतीय निजी रक्षा कंपनियों को ट्रांसफर करने की मंजूरी दे दी है। इसका उद्देश्य मिसाइलों का उत्पादन बढ़ाना, सप्लाई में तेजी लाना और देश के घरेलू डिफेंस इकोसिस्टम को मजबूत करना है।
रक्षा मंत्रालय के इस फैसले के बाद DRDO द्वारा विकसित चुनिंदा पारंपरिक मिसाइलों की निर्माण तकनीक, परीक्षण और संबंधित सिस्टम निजी रक्षा उद्योग को उपलब्ध कराए जा सकेंगे। इससे बड़ी रक्षा कंपनियों के साथ-साथ छोटे और मध्यम उद्योगों को भी मिसाइलों के अलग-अलग उपकरण और तकनीकी सिस्टम बनाने का अवसर मिलेगा।
इस कदम से सेना के लिए मिसाइलों की उपलब्धता और उत्पादन क्षमता बढ़ने की उम्मीद है। साथ ही रक्षा उत्पादन में सरकारी संस्थानों पर निर्भरता कम करते हुए निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जा सकेगी।
इस फैसले के तहत DRDO की तकनीक वाली पारंपरिक मिसाइलों को शामिल किया जा सकता है। इनमें सतह से सतह पर मार करने वाली प्रलय, हवा से हवा में मार करने वाली अस्त्र मार्क-2 और अस्त्र मार्क-3, एंटी-रेडिएशन मिसाइल रुद्रम, लंबी दूरी की पनडुब्बी रोधी मिसाइल SMART, निर्भय, हेलिना, ध्रुवास्त्र और आकाश-एनजी जैसे सिस्टम शामिल हैं।
हालांकि सभी मिसाइलों की पूरी तकनीक निजी कंपनियों को हस्तांतरित हो, यह जरूरी नहीं है। संवेदनशील तकनीक को सुरक्षा कारणों से सीमित रखा जा सकता है।
आकाश-एनजी जैसी अत्याधुनिक मिसाइल प्रणालियों में इस्तेमाल होने वाले सीकर, सॉफ्टवेयर कोड और अन्य संवेदनशील तकनीकी प्रणालियां महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। ऐसे में इनकी पूरी तकनीक निजी कंपनियों को सौंपने की संभावना कम है।
DRDO संवेदनशील तकनीक को अपने नियंत्रण में रखते हुए बुनियादी असेंबली या आवश्यक तकनीकी हिस्से ही निजी उद्योग को उपलब्ध करा सकता है।
यह फैसला सभी मिसाइलों पर लागू नहीं होगा। परमाणु हथियार ले जाने वाली रणनीतिक मिसाइलें इस तकनीकी हस्तांतरण के दायरे से बाहर रहेंगी। फोकस मुख्य रूप से पारंपरिक हथियार प्रणालियों के उत्पादन और उनकी सप्लाई क्षमता बढ़ाने पर रहेगा।
पारंपरिक मिसाइलों में रासायनिक विस्फोटक आधारित वारहेड का इस्तेमाल होता है और इनका उद्देश्य बंकर, रडार, रनवे, टैंक या दुश्मन के जहाज जैसे सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाना होता है।
देश की प्रमुख निजी रक्षा कंपनियां इस क्षेत्र में संभावित साझेदार बन सकती हैं। टाटा, एलएंडटी, भारत फोर्ज और अदाणी डिफेंस जैसी कंपनियां पहले से रक्षा उत्पादन और मिसाइल सिस्टम से जुड़े क्षेत्रों में सक्रिय हैं।
हालांकि सरकार की कोशिश केवल बड़ी कंपनियों तक इस अवसर को सीमित रखने की नहीं होगी। रक्षा क्षेत्र के MSME उद्योगों को भी मिसाइलों के अलग-अलग कंपोनेंट और सिस्टम के निर्माण में शामिल किया जा सकता है।
फिलहाल सरकारी रक्षा कंपनी भारत डायनेमिक्स लिमिटेड (BDL) देश में मिसाइल निर्माण की प्रमुख कंपनियों में शामिल है। मिसाइलों के ईंधन, वारहेड और अन्य हिस्सों का निर्माण देश की विभिन्न कंपनियों द्वारा किया जाता है, जबकि BDL जैसे संस्थान इन हिस्सों को जोड़कर पूरा मिसाइल सिस्टम तैयार करते हैं।
वहीं, सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल ब्रह्मोस के निर्माण में भारत और रूस की संयुक्त कंपनी ब्रह्मोस एयरोस्पेस की अलग भूमिका है।
तकनीक हासिल करने के बाद निजी कंपनियां अपनी इच्छा से मिसाइलों की बिक्री नहीं कर सकेंगी। रक्षा निर्यात नियमों और G2G (Government-to-Government) प्रोटोकॉल के तहत आवश्यक मंजूरी और रक्षा मंत्रालय से NOC लेना होगा।
सुरक्षा के लिहाज से तकनीकी हस्तांतरण में भी सीमाएं रखी जा सकती हैं। DRDO किसी तकनीक के लिए कम से कम दो कंपनियों को साझेदार बनाने की व्यवस्था अपना सकता है, ताकि उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ रणनीतिक सुरक्षा भी बनी रहे।
भारत की मौजूदा सुरक्षा परिस्थितियों में बड़ी संख्या में आधुनिक हथियारों और मिसाइलों की उपलब्धता महत्वपूर्ण है। निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ने से उत्पादन क्षमता में इजाफा हो सकता है और सेना को समय पर मिसाइलों की आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है।
सरकार का यह कदम 'मेक इन इंडिया' और आत्मनिर्भर भारत की रक्षा क्षेत्र में नीति को भी मजबूती देने वाला माना जा रहा है।
किसी मिसाइल को डिजाइन से लेकर परीक्षण और उत्पादन तक पहुंचाने में कई साल लग सकते हैं। उदाहरण के तौर पर पहली प्रलय मिसाइल को डिजाइन और टेस्टिंग के चरण से गुजरने में करीब 7-8 साल लगे। वहीं आकाश-एनजी के विकास में भी कई वर्ष लगे हैं।
हालांकि एक बार तकनीक और उत्पादन क्षमता स्थापित होने के बाद बड़े पैमाने पर निर्माण में तेजी लाई जा सकती है। अंतिम रूप से किसी मिसाइल की सप्लाई में लगने वाला समय उत्पादन क्षमता, ऑर्डर और रक्षा मंत्रालय की आवश्यकताओं पर निर्भर करेगा।
DRDO की तकनीक को निजी उद्योग तक पहुंचाने से भारत के रक्षा उत्पादन तंत्र में कई स्तरों पर बदलाव की उम्मीद है। इससे मिसाइल उत्पादन क्षमता बढ़ेगी, निजी कंपनियों और MSME की भागीदारी बढ़ेगी, सप्लाई चेन मजबूत होगी और सेना को समय पर हथियार उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।