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बिलासपुर शिक्षा विभाग में युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति की प्रक्रिया को लेकर उठे विवाद ने अब नया मोड़ ले लिया है। जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद जहां तत्कालीन जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) विजय टांडे की भूमिका पर सवाल उठाते हुए उन्हें जिम्मेदार माना गया है, वहीं स्थापना शाखा के प्रभारी क्लर्क सुनील यादव की भूमिका को लेकर शिकायतकर्ता द्वारा उठाए गए सवालों ने जांच की निष्पक्षता पर ही प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।
शिकायतकर्ता अंकित गौरहा का आरोप है कि जांच समिति के सामने जिन दस्तावेजों के आधार पर तत्कालीन डीईओ की जिम्मेदारी तय की गई, उन्हीं दस्तावेजों में स्थापना शाखा के प्रभारी क्लर्क की भूमिका से जुड़े तथ्य भी मौजूद थे। इसके बावजूद उनकी भूमिका पर उसी स्तर पर जांच नहीं की गई। हालांकि, सुनील यादव के खिलाफ लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और इस मामले में संबंधित अधिकारी तथा शिक्षा विभाग का पक्ष सामने आना बाकी है।
एक ही दस्तावेज, लेकिन जांच का पैमाना अलग क्यों?
शिकायतकर्ता अंकित गौरहा के मुताबिक उन्होंने युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति से संबंधित पूरा रिकॉर्ड जांच समिति के समक्ष प्रस्तुत किया था। उनका दावा है कि समिति ने उपलब्ध दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर तत्कालीन डीईओ विजय टांडे की भूमिका को दोषपूर्ण माना।
गौरहा का कहना है कि उसी रिकॉर्ड में स्थापना शाखा के प्रभारी क्लर्क सुनील यादव की भूमिका से संबंधित तथ्य भी मौजूद हैं। उन्होंने जांच समिति से मांग की थी कि दस्तावेजों में जिन-जिन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका सामने आती है, उनकी भी जांच की जाए।
लेकिन शिकायतकर्ता का आरोप है कि जांच रिपोर्ट में यादव की भूमिका को लेकर कोई स्पष्ट निष्कर्ष सामने नहीं आया। यही स्थिति अब पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल बनकर उभर रही है।
यदि किसी दस्तावेज के आधार पर किसी अधिकारी की जवाबदेही तय की जा सकती है, तो उसी दस्तावेज में सामने आने वाले अन्य संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच क्यों नहीं की गई? शिकायतकर्ता इसी सवाल का जवाब मांग रहे हैं।
पुराने मामले का हवाला देकर भी उठाए सवाल
अंकित गौरहा ने करीब तीन वर्ष पुराने एक मामले का भी हवाला दिया है। उनके मुताबिक तत्कालीन खंड शिक्षा अधिकारी एमएल पटेल के कार्यकाल में एक मामले की विभागीय जांच हुई थी। शिकायतकर्ता का दावा है कि उस जांच में सुनील यादव की भूमिका को लेकर भी सवाल उठे थे और उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई, यहां तक कि निलंबन की सिफारिश किए जाने की बात सामने आई थी।
गौरहा के अनुसार इसके बावजूद कार्रवाई का मुख्य असर तत्कालीन खंड शिक्षा अधिकारी एमएल पटेल पर पड़ा और उन्हें निलंबित कर दिया गया, जबकि सुनील यादव के खिलाफ उसी स्तर की कार्रवाई नहीं हुई।
शिकायतकर्ता इसी घटनाक्रम को मौजूदा विवाद से जोड़ते हुए सवाल उठा रहे हैं कि क्या विभागीय जांच में अधिकारी और कर्मचारी के लिए अलग-अलग मापदंड अपनाए जा रहे हैं?
हालांकि, इस पुराने मामले में कार्रवाई और जांच से संबंधित सभी दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने तथा उनका स्वतंत्र सत्यापन होने के बाद ही आरोपों की पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
150 से 200 शिकायतों का दावा
शिकायतकर्ता ने सुनील यादव के खिलाफ बड़ी संख्या में शिकायतें किए जाने का भी दावा किया है। गौरहा के अनुसार अलग-अलग समय पर करीब 150 से 200 शिकायतें विभिन्न स्तरों पर की जा चुकी हैं।
इन शिकायतों में प्रतिनियुक्ति, स्थानांतरण-पदस्थापना और वर्तमान में चल रही विकल्प प्रक्रिया से जुड़े मामलों का उल्लेख होने की बात कही गई है।
गौरहा का दावा है कि शिकायतें कमिश्नर, विभागीय सचिव, कलेक्टर और मंत्री स्तर तक भी पहुंचाई गईं। ऐसे में उनका सवाल है कि यदि शिकायतें लगातार अलग-अलग स्तरों तक पहुंचती रही हैं तो उनकी जांच का परिणाम क्या रहा? क्या प्रत्येक शिकायत की स्वतंत्र जांच की गई और यदि की गई तो उसके आधार पर क्या कार्रवाई हुई?
यही जानकारी अब पूरे मामले में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
मंत्री से करीबी संबंधों की चर्चा, लेकिन पुष्टि नहीं
पूरे मामले में सुनील यादव के शिक्षा मंत्री से कथित करीबी संबंधों की चर्चा भी सामने आने का दावा किया जा रहा है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि कथित राजनीतिक पहुंच के कारण यादव लगातार कार्रवाई से बचते रहे।
हालांकि, राजनीतिक संबंधों या किसी प्रभाव के कारण विभागीय कार्रवाई प्रभावित होने के आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे आरोपों की वास्तविकता संबंधित दस्तावेजों, जांच रिपोर्ट और विभागीय कार्रवाई के रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकती है।
सुनील यादव की ओर से भी इन आरोपों पर उनका पक्ष सामने आना बाकी है।
कलेक्टर के जांच आदेश के बाद भी नया आरोप
शिकायतकर्ता ने यह भी दावा किया है कि हाल ही में कलेक्टर की ओर से सुनील यादव के खिलाफ जांच के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद उन्होंने कथित तौर पर अपनी जगह एक चपरासी को बैठाकर स्थापना शाखा का काम कराया।
यदि शिकायतकर्ता का यह आरोप सही पाया जाता है तो यह भी जांच का विषय बन सकता है कि किसी कर्मचारी को अपनी जगह किसी अन्य कर्मचारी से शाखा का काम कराने की अनुमति किस स्तर से मिली थी और संबंधित अधिकारियों को इसकी जानकारी थी या नहीं।
फिलहाल इस आरोप की भी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति विवाद में क्यों महत्वपूर्ण है स्थापना शाखा?
शिक्षा विभाग में युक्तियुक्तकरण, पदोन्नति, स्थानांतरण और पदस्थापना जैसे मामलों में स्थापना शाखा की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ऐसे मामलों से संबंधित रिकॉर्ड तैयार करने, दस्तावेजों के परीक्षण, प्रस्तावों को आगे बढ़ाने और संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया में शाखा के कर्मचारियों की जिम्मेदारी होती है।
इसी वजह से शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि किसी प्रक्रिया में अनियमितता पाई जाती है तो केवल अधिकारी की जवाबदेही तय करने के बजाय उन सभी स्तरों की भूमिका की जांच जरूरी है, जहां से संबंधित रिकॉर्ड या प्रक्रिया गुजरी है।
अब जांच की पारदर्शिता पर टिकी नजर
मौजूदा विवाद में अब सवाल सिर्फ तत्कालीन डीईओ विजय टांडे की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रह गया है। शिकायतकर्ता की मांग है कि जांच समिति द्वारा देखे गए पूरे रिकॉर्ड की दोबारा समीक्षा की जाए और उसमें जिन-जिन अधिकारियों तथा कर्मचारियों की भूमिका सामने आती है, उनकी समान मापदंड पर जांच हो।
शिकायतकर्ता का कहना है कि यदि किसी अधिकारी को दस्तावेजों के आधार पर जिम्मेदार माना गया है तो उन्हीं दस्तावेजों में उल्लेखित अन्य संबंधित लोगों की भूमिका पर भी स्पष्ट निष्कर्ष सामने आना चाहिए।
इस पूरे मामले में शिक्षा विभाग के सामने अब दो बड़ी चुनौतियां हैं—पहली, युक्तियुक्तकरण और पदोन्नति से जुड़े विवाद में वास्तविक जिम्मेदारी तय करना और दूसरी, जांच प्रक्रिया को लेकर उठ रहे निष्पक्षता के सवालों का स्पष्ट जवाब देना।
यदि विभाग सभी संबंधित दस्तावेजों की निष्पक्ष समीक्षा कर जिम्मेदारी तय करता है, तो इससे न केवल शिकायतकर्ता की आपत्तियों का समाधान हो सकता है, बल्कि भविष्य में शिक्षा विभाग की स्थानांतरण, पदोन्नति और युक्तियुक्तकरण जैसी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता को लेकर भी भरोसा मजबूत होगा।
नोट: सुनील यादव के खिलाफ लगाए गए आरोपों और राजनीतिक प्रभाव संबंधी दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित अधिकारी/विभाग का पक्ष मिलने पर उसे भी खबर में शामिल किया जाना आवश्यक होगा।