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रायपुर। दिल्ली में पांच मंजिला इमारत ढहने की घटना के बाद छत्तीसगढ़ सरकार ने प्रदेश में जर्जर और जोखिमपूर्ण भवनों को लेकर सख्ती बढ़ाने का फैसला किया है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने गुरुवार को सभी जिलों के कलेक्टर और एसपी के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बैठक कर स्कूल, छात्रावास, पीजी, कोचिंग सेंटर, पुस्तकालय और अन्य बड़े सार्वजनिक व शैक्षणिक भवनों का तत्काल सेफ्टी ऑडिट कराने के निर्देश दिए हैं। मुख्यमंत्री ने साफ कहा कि प्रशासन की जिम्मेदारी किसी हादसे के बाद कार्रवाई करने तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि संभावित खतरे की पहले पहचान कर उसे दूर करना भी प्रशासन की जिम्मेदारी है।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि जिन भवनों में लोगों, खासकर बच्चों और विद्यार्थियों की जान को खतरा है, उन्हें चिन्हित किया जाए और जरूरत पड़ने पर ऐसे भवनों को खाली कराने या ढहाने की कार्रवाई की जाए। सुरक्षा मानकों के पालन में लापरवाही सामने आने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही तय कर कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
प्रदेश में 3,931 स्कूल और छात्रावास भवन जर्जर
बैठक के बीच सामने आई जानकारी के मुताबिक प्रदेश में बड़ी संख्या में स्कूल और शैक्षणिक भवन जर्जर स्थिति में हैं। प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार 3,931 स्कूल और छात्रावास भवन जर्जर बताए गए हैं। इनमें कई ऐसे भवन हैं, जहां रोजाना बड़ी संख्या में बच्चे और विद्यार्थी पहुंचते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक करीब 150 जर्जर भवन राजधानी रायपुर में ही बताए गए हैं। इसके अलावा प्रदेश में लगभग 2,500 आंगनबाड़ी केंद्र भी जर्जर स्थिति में बताए गए हैं। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती केवल स्कूल भवनों तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों से जुड़े दूसरे संस्थानों की सुरक्षा भी बड़ा मुद्दा बन गई है।
रायपुर में भी कई जर्जर इमारतें बनीं खतरे की वजह
रायपुर में जर्जर भवनों की स्थिति को लेकर भी चिंता सामने आई है। रिपोर्ट में सदर बाजार मेन रोड स्थित एक दो मंजिला जर्जर भवन का उदाहरण दिया गया है, जहां सरिया और कंक्रीट के हिस्से लटक रहे हैं। लोगों की सुरक्षा को देखते हुए नीचे बांस की बल्लियां लगाकर सहारा दिया गया है।
इसी तरह तेलघानी नाका चौक और गणेशराम नगर सहित शहर के अलग-अलग हिस्सों में भी जर्जर भवनों की मौजूदगी बताई गई है। इससे सवाल उठता है कि क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार करने के बाद ही इन भवनों पर कार्रवाई होगी या प्रशासन पहले से इनकी सुरक्षा जांच कर ठोस कदम उठाएगा।
सरकारी कॉलेजों और आंगनबाड़ी भवनों की हालत भी चिंता का विषय
जर्जर भवनों की समस्या केवल स्कूलों तक सीमित नहीं है। प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में 111 सरकारी कॉलेज ऐसे हैं जिनके पास अपना भवन नहीं है, जबकि जिन भवनों में कई संस्थान संचालित हो रहे हैं, उनकी स्थिति भी चिंता का विषय बताई गई है।
इसी तरह हजारों आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति भी सवालों के घेरे में है। यदि इन भवनों की समय रहते तकनीकी जांच नहीं की गई तो बच्चों और कर्मचारियों की सुरक्षा पर खतरा बना रह सकता है।
पीजी और कोचिंग सेंटरों की सुरक्षा पर भी सवाल
मुख्यमंत्री के निर्देशों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा निजी पीजी, हॉस्टल और कोचिंग सेंटर भी हैं। छत्तीसगढ़ में बड़ी संख्या में छात्र दूसरे शहरों में पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पीजी व हॉस्टल में रहते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में करीब 2,500 से 3,000 निजी पीजी और हॉस्टल तथा एक हजार से अधिक कोचिंग सेंटर संचालित हो रहे हैं। इनमें कई संस्थानों के पास कथित तौर पर स्ट्रक्चरल सेफ्टी सर्टिफिकेट और फायर सेफ्टी की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि कई कोचिंग और पीजी संस्थान व्यावसायिक उपयोग के लिए निर्धारित भवनों के बजाय सामान्य आवासीय मकानों में संचालित होने की बात सामने आई है। कई जगह बहुमंजिला इमारतें और संकरी गलियां होने के कारण आपात स्थिति में बचाव कार्य भी मुश्किल हो सकता है।
एकीकृत डेटाबेस नहीं होने से निगरानी की चुनौती
निजी हॉस्टल और कोचिंग सेंटरों की सुरक्षा को लेकर एक और बड़ी चुनौती सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार राज्य में ऐसा कोई एकीकृत सरकारी पोर्टल या डेटाबेस नहीं है, जिससे यह आसानी से पता चल सके कि किस शहर में कितने निजी हॉस्टल और कोचिंग सेंटर संचालित हैं और उनमें से कितने सुरक्षा मानकों को पूरा करते हैं।
ऐसे में सरकार के सामने अब केवल सेफ्टी ऑडिट कराने की चुनौती नहीं है, बल्कि सुरक्षा मानकों की निगरानी के लिए प्रभावी सिस्टम तैयार करने की भी जरूरत है।
मुख्यमंत्री बोले- हादसे का इंतजार न करें अधिकारी
बैठक में मुख्यमंत्री साय ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि किसी घटना के होने का इंतजार नहीं किया जाना चाहिए। स्कूलों, छात्रावासों, पुस्तकालयों और अन्य सार्वजनिक स्थलों के पुराने भवनों की सुरक्षा जांच पहले से की जाए।
उन्होंने कहा कि संभावित खतरों की पहचान कर उन्हें समय रहते दूर करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। कलेक्टर और एसपी यह सुनिश्चित करें कि सरकार के निर्देश केवल कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि उनका असर जमीन पर दिखाई दे। अधिकारियों को तत्काल कार्रवाई शुरू करने के साथ ही इसकी नियमित समीक्षा करने के निर्देश दिए गए हैं।
जर्जर भवनों को लेकर जवाबदेही भी तय होगी
सरकार ने यह भी संकेत दिया है कि सेफ्टी ऑडिट और सुरक्षा मानकों के पालन में लापरवाही मिलने पर संबंधित अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। यानी अब किसी भवन की जर्जर हालत सामने आने के बाद भी कार्रवाई नहीं करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जा सकती है।
मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देशित किया कि जहां भवन मानव जीवन के लिए खतरा बन चुके हैं, वहां आवश्यक कार्रवाई में देरी न की जाए।
अवैध और मिलावटी शराब पर भी सख्ती
इसी बैठक में मुख्यमंत्री ने अवैध और मिलावटी शराब के खिलाफ भी प्रदेशभर में विशेष अभियान चलाने के निर्देश दिए। आबकारी विभाग, पुलिस और जिला प्रशासन की संयुक्त टीमें बनाकर अवैध शराब के निर्माण, भंडारण, बिक्री और परिवहन के संभावित ठिकानों पर छापेमारी की जाएगी।
सीमावर्ती इलाकों में दूसरे राज्यों से आने वाली अवैध शराब पर रोक लगाने के लिए निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। मिलावट या अवैध शराब के कारोबार में शामिल लोगों के खिलाफ कठोर वैधानिक कार्रवाई करने को कहा गया है।
अब असली परीक्षा जमीन पर अमल की
सरकार के इन निर्देशों के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि प्रदेश में जर्जर भवनों की पहचान और सेफ्टी ऑडिट की प्रक्रिया कितनी तेजी से पूरी होती है। हजारों स्कूलों, आंगनबाड़ी केंद्रों, हॉस्टल, पीजी और कोचिंग संस्थानों से जुड़े सुरक्षा इंतजामों की जांच आसान नहीं होगी।
लेकिन दिल्ली जैसे हादसों के बाद यह साफ है कि सुरक्षा व्यवस्था में लापरवाही की कीमत सीधे लोगों की जान से जुड़ी है। ऐसे में मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद अब कलेक्टर और एसपी के सामने चुनौती है कि जर्जर भवनों की सूची तैयार करने से आगे बढ़कर वास्तविक कार्रवाई सुनिश्चित करें और संभावित हादसों को समय रहते रोकें।