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A historic step for Sirpur towards becoming a World Heritage Site: Chhattisgarh’s ancient cultural town has been included in UNESCO’s tentative list.
रायपुर। छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए बड़ी उपलब्धि सामने आई है। महासमुंद जिले में महानदी के तट पर स्थित प्राचीन नगरी सिरपुर को संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची (Tentative List) में शामिल किया गया है। इस उपलब्धि से सिरपुर की समृद्ध पुरातात्विक विरासत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं। प्राचीन मंदिरों, बौद्ध विहारों, दुर्लभ मूर्तियों और धार्मिक सहिष्णुता की अनूठी परंपरा के लिए प्रसिद्ध सिरपुर अब विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए प्रयासरत है। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के मार्गदर्शन में प्रदेश के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर स्थापित करने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। सिरपुर का UNESCO की अस्थायी सूची में शामिल होना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने 1 जनवरी 2026 को सिरपुर के ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों का निरीक्षण किया था। इस दौरान उन्होंने यहां की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, प्राचीन स्मारकों और स्थापत्य कला की सराहना की थी। साथ ही, सिरपुर के संरक्षण एवं संवर्धन और इसे UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के लिए प्राथमिकता से प्रयास करने की बात कही थी।
प्राचीन काल में श्रीपुर के नाम से प्रसिद्ध सिरपुर पाण्डुवंशी शासकों के शासनकाल में दक्षिण कोसल की राजधानी रहा। महानदी के तट पर स्थित यह नगर राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था।
शरभपुरीय शासकों के ताम्रपत्रों से सिरपुर की प्राचीनता के महत्वपूर्ण प्रमाण मिलते हैं। पाण्डुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के शासनकाल में यहां मंदिरों, बौद्ध विहारों, सरोवरों और उद्यानों का निर्माण हुआ। सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस क्षेत्र की यात्रा की थी। उनके यात्रा विवरणों में यहां बौद्ध धर्म की समृद्ध परंपरा का उल्लेख मिलता है।

सिरपुर की सबसे बड़ी विशेषता यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं का सहअस्तित्व है। शैव मत के अनुयायी महाशिवगुप्त बालार्जुन ने बौद्ध विहारों को भी संरक्षण और दान प्रदान किया था। यह परंपरा प्राचीन भारत में धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समन्वय का महत्वपूर्ण उदाहरण मानी जाती है।
सिरपुर का प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर भारतीय स्थापत्य कला की अनमोल धरोहरों में शामिल है। लगभग सातवीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर प्राचीन ईंट स्थापत्य के उत्कृष्ट उदाहरणों में गिना जाता है। इसकी पंचरथ शैली, अलंकृत प्रवेश द्वार, सूक्ष्म शिल्पांकन और पौराणिक दृश्यों की कलात्मक प्रस्तुति इसकी विशेष पहचान है।
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार मंदिर का निर्माण रानी वासटा ने अपने दिवंगत पति हर्षगुप्त की स्मृति में कराया था। लगभग 650 ईस्वी का माना जाने वाला यह मंदिर आज भी सिरपुर की कलात्मक प्रतिभा और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक है।
महानदी के तट पर स्थित गंधेश्वर महादेव मंदिर सिरपुर की धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है। प्राचीन काल में गंधर्वेश्वर के नाम से प्रसिद्ध इस मंदिर में पुराने मंदिरों और बौद्ध विहारों से प्राप्त स्थापत्य खंडों का उपयोग किया गया है। परिसर में मौजूद प्रतिमाएं और पुरातात्विक अवशेष क्षेत्र की प्राचीन कला एवं धार्मिक जीवन की जानकारी देते हैं।
सिरपुर प्राचीन भारत में महायान बौद्ध धर्म का प्रमुख केंद्र रहा है। यहां पुरातात्विक उत्खनन के दौरान आनंदप्रभु कुटी विहार, स्वास्तिक विहार और तीवरदेव महाविहार सहित कई महत्वपूर्ण संरचनाओं के अवशेष मिले हैं।
आनंदप्रभु कुटी विहार में भिक्षुओं के निवास के लिए 14 कक्ष थे। यहां भगवान बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा में लगभग साढ़े छह फुट ऊंची प्रतिमा भी प्राप्त हुई है। वहीं, तीवरदेव महाविहार के अवशेष अपनी विशाल संरचना, अलंकृत प्रवेश द्वार और विकसित निर्माण तकनीक के लिए विशेष महत्व रखते हैं।

सिरपुर का सुरंग टीला अपनी विशिष्ट संरचना, सीढ़ियों और मंदिर अवशेषों के कारण महत्वपूर्ण है। इसके अलावा, लक्ष्मण मंदिर के पूर्व में स्थित प्राचीन राम मंदिर के अवशेष भी क्षेत्र की स्थापत्य परंपरा को दर्शाते हैं। ईंटों से निर्मित इस मंदिर की ताराकृति योजना इसे पुरातात्विक दृष्टि से विशिष्ट बनाती है।
सिरपुर में विभिन्न चरणों में हुए उत्खननों से दो हजार से अधिक पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। इनमें धातु प्रतिमाएं, आभूषण निर्माण के उपकरण, लोहे के बर्तन, ताले, जंजीर, दीपक, पूजा पात्र, मिट्टी के घड़े, कांच की चूड़ियां, मुहरें, खिलौने और प्राचीन सिक्के शामिल हैं।
इन अवशेषों से सिरपुर के प्राचीन व्यापारिक संपर्कों, आर्थिक गतिविधियों और सांस्कृतिक विकास की जानकारी मिलती है। यहां प्राप्त विभिन्न कालखंडों के सिक्के भी इस नगरी के ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करते हैं।
सातवीं और आठवीं शताब्दी के दौरान सिरपुर उत्कृष्ट धातु प्रतिमाओं के निर्माण के लिए प्रसिद्ध रहा। वर्ष 1939 में यहां से धातु प्रतिमाओं का महत्वपूर्ण भंडार प्राप्त हुआ था। इनमें भगवान बुद्ध, अवलोकितेश्वर, पद्मपाणि, वज्रपाणि, मंजुश्री, तारा, ऋषभनाथ और भगवान विष्णु की प्रतिमाएं शामिल हैं।
इन प्रतिमाओं की सूक्ष्म कलाकारी, भावपूर्ण मुखाकृति और अलंकरण भारतीय धातु मूर्तिकला की उच्च परंपरा को दर्शाते हैं। सिरपुर से प्राप्त कई कलाकृतियां देश के प्रमुख संग्रहालयों में संरक्षित हैं और विदेशों में भी प्रदर्शित की जा चुकी हैं।
लक्ष्मण मंदिर परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा स्थापित संग्रहालय सिरपुर की प्राचीन कला और संस्कृति का महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं से जुड़ी प्रतिमाएं तथा स्थापत्य अवशेष संरक्षित हैं।
चतुर्मुख शिवलिंग, महिषासुरमर्दिनी, नृसिंह, चामुंडा, विष्णु, सूर्य, जैन तीर्थंकर और भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं संग्रहालय के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हैं।
वर्ष 2000-01 के दौरान महानदी के तट के समीप किए गए उत्खनन में एक विशाल परिसर के अवशेष मिले, जिन्हें राजमहल से संबंधित माना गया। यहां भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की महत्वपूर्ण प्रतिमाएं भी प्राप्त हुईं। इन अवशेषों से प्राचीन सिरपुर की राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक समृद्धि का पता चलता है।
सिरपुर को UNESCO की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची में शामिल किए जाने से छत्तीसगढ़ में सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इससे देश-विदेश के पर्यटकों, इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, शोधकर्ताओं और बौद्ध धर्म के अनुयायियों का आकर्षण बढ़ सकता है।
पर्यटकों की संख्या में संभावित वृद्धि से स्थानीय स्तर पर होटल, होमस्टे, परिवहन, हस्तशिल्प, स्थानीय व्यंजन और पर्यटन सेवाओं से जुड़े रोजगार के अवसर विकसित हो सकते हैं। सिरपुर की बौद्ध विरासत को अंतरराष्ट्रीय बौद्ध पर्यटन परिपथ से जोड़ने की संभावनाएं भी महत्वपूर्ण हैं।
UNESCO की अस्थायी सूची में शामिल होना विश्व धरोहर का दर्जा प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक चरण है। इसके बाद निर्धारित मानकों के अनुरूप विस्तृत नामांकन दस्तावेज तैयार करने, संरक्षण प्रबंधन व्यवस्था सुनिश्चित करने और मूल्यांकन की प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
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सिरपुर की प्राचीन मंदिर वास्तुकला, बौद्ध विहार, दुर्लभ मूर्तिकला और विभिन्न धार्मिक परंपराओं के ऐतिहासिक सहअस्तित्व की विशेषताएं इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण सांस्कृतिक स्थल के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
सिरपुर का UNESCO की अस्थायी सूची में शामिल होना छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक गौरव के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। महानदी के तट पर सदियों से अपनी विरासत संजोए यह प्राचीन नगरी अब वैश्विक पहचान की नई यात्रा पर आगे बढ़ रही है। आने वाले समय में संरक्षण, शोध और पर्यटन विकास के समन्वित प्रयास सिरपुर की अमूल्य धरोहर को देश-दुनिया के सामने और प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।