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Anti-Naxal Operation: Major surrender of 42 Naxalites in Telangana, cadres carrying rewards of Rs 1.93 crore join the mainstream
हैदराबाद। तेलंगाना में माओवादी संगठन पर अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई सामने आई है। प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) के 42 सदस्यों ने हथियारों के साथ पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। इनमें पीएलजीए बटालियन के कमांडर सोडी मल्ला उर्फ केशा भी शामिल हैं। इस सरेंडर के बाद माओवादी संगठन की सैन्य संरचना को लगभग समाप्त माना जा रहा है।
1.93 करोड़ के इनामी कैडर हुए मुख्यधारा में शामिल
सरेंडर करने वाले सभी 42 नक्सलियों पर कुल मिलाकर करीब 1.93 करोड़ रुपये का इनाम घोषित था। लंबे समय से ये कैडर छत्तीसगढ़ और तेलंगाना सीमा क्षेत्र में सक्रिय थे और कई बड़े नक्सली अभियानों से जुड़े रहे हैं।
भारी हथियारों के साथ आत्मसमर्पण, सेना जैसी ताकत का खुलासा
आत्मसमर्पण के दौरान नक्सलियों ने बड़ी मात्रा में हथियार पुलिस को सौंपे। इनमें 5 एके-47, 4 एसएलआर, 3 इंसास राइफल, स्टेन गन, पिस्तौल, रिवॉल्वर, 1000 से अधिक जिंदा कारतूस और दो देशी ग्रेनेड शामिल हैं। यह जखीरा किसी संगठित सैन्य इकाई जैसी क्षमता को दर्शाता है।
800 ग्राम सोना भी किया गया बरामद
सरेंडर के दौरान नक्सलियों ने लगभग 800 ग्राम सोना भी पुलिस को सौंपा। बताया जा रहा है कि यह सोना लेवी वसूली से जुटाया गया था और वर्षों से संगठन के पास सुरक्षित रखा गया था। इसकी कीमत करोड़ों रुपये आंकी जा रही है।
बस्तर और तेलंगाना सीमा पर छिपे थे कैडर
सूत्रों के अनुसार पीएलजीए बटालियन के ये सदस्य लंबे समय से छत्तीसगढ़ और तेलंगाना सीमा क्षेत्र में छिपे हुए थे। माओवादी कमांडर हिड़मा के एनकाउंटर के बाद संगठन की संरचना कमजोर पड़ गई थी, जिसके बाद यह सरेंडर और तेज हुआ।
पुनर्वास नीति के तहत सुरक्षा और राहत
सरेंडर करने वाले सभी नक्सलियों को तत्काल राहत और पुनर्वास योजना के तहत सहायता दी गई है। उन्हें फिलहाल सुरक्षा कैंपों में रखा गया है और बाद में सीमा क्षेत्रों में पुनर्वास की प्रक्रिया अपनाई जाएगी ताकि वे मुख्यधारा में सामान्य जीवन शुरू कर सकें।
तेलंगाना पुलिस का दावा, माओवादी ढांचा लगभग खत्म
तेलंगाना पुलिस ने इसे बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा है कि राज्य में माओवादी सशस्त्र गतिविधियां लगभग समाप्त हो चुकी हैं। अधिकारियों के अनुसार संगठन की राज्य समिति और सैन्य इकाई अब प्रभावी रूप से निष्क्रिय हो चुकी है।
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार बड़ा रणनीतिक बदलाव
सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में लगातार आत्मसमर्पण और कार्रवाई के चलते माओवादी संगठन की पकड़ कमजोर हुई है। इस सरेंडर को माओवादी आंदोलन के लिए एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।