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Death Penalty for Corruption: A New Debate Emerges – Advocate Nikhil Bhatt
इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति श्री अतुल श्रीधरन ने उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई से जुड़े मामले में फैसला सुनाते हुए देश में व्याप्त भ्रष्टाचार पर एक अत्यंत तीखी टिप्पणी की उन्होंने कहा कि राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी से जुड़ा हालिया विवाद ईमानदारी के पतन की पराकाष्ठा को दर्शाता है उन्होंने आगे कहा कि यह घटना सब्र के घड़े के टूटने जैसा है । जो समाज राम मंदिर जैसी पवित्र जगह में चोरी से विचलित ना हो उसे भला कोई क्या शर्म दिला सकता है । भ्रष्टाचार पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार इस कदर सामान्य हो चुका है कि जब तक कोई पकड़ न जाए तब तक लोग उसे गलत नहीं मानते। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रैंकिंग में देश की स्थिति भी समाज को लज्जित नहीं करती यदि सरकार भ्रष्टाचार समाप्त करने के लिए प्रति गंभीर है तो भ्रष्टाचार के दोषियों के लिए मृत्युदंड का प्रावधान करने पर विचार करना चाहिए ।
देश में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर न्यायमूर्ति श्री अतुल श्रीधरन की इस टिप्पणी में एक नई बहस को जन्म दिया है इसमें कोई संदेह नहीं है कि वर्तमान में भ्रष्टाचार पूरे शासन, प्रशासन और समाज में व्याप्त हो चुका है ऐसा कोई क्षेत्र नहीं बचा जहां भ्रष्टाचार ने प्रवेश न किया हो किसी भी सरकारी विभाग में तब तक काम नहीं होता जब तक संबंधित अधिकारियों की जेबें गर्म नहीं की जाती और यदि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं करता है तो उसकी चप्पलें अपने काम के लिए चक्कर लगा लगा कर घिस जाती है इन परिस्थितियों में वह मजबूर होकर भ्रष्टाचार को अपनाता है और देखते ही देखते उसका काम मिनिटों में हो जाता है । अक्सर हम समाचार पत्रों में ये पढ़ते हैं कि अमुक अधिकारी के यहां करोड़ों की संपत्ति मिली या किसी नेता की काली कमाई का पता चला यहां तक कि महिला अधिकारी भी इस भ्रष्टाचार में आतंक डूब गई हैं जबकि ये माना जाता था कि महिलाएं भ्रष्टाचार से दूर रहती है लेकिन जब वे सिस्टम में आती है तो फिर उन्हें भी सिस्टम का हिस्सा बनना ही पड़ता है । छोटे से छोटे नेता से लेकर बड़े से बड़े नेता तक भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाते नजर आते हैं अक्सर ये देखा जाता है कि जो लोग रिश्वत लेते हुए पकड़े जाते हैं वे बाद में रिश्वत देखकर छूट भी जाते हैं भ्रष्टाचार ने हमारे समाज को इतना भ्रष्ट कर दिया है कि अब लोगों ने भ्रष्टाचार को शिष्टाचार के रूप में अपना लिया है । किसी जमाने में यदि कोई व्यक्ति रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता था तो उसका सामाजिक बहिष्कार होता था लेकिन आज की तारीख में आए दिन इस तरह की खबरें अखबारों की सुर्खियां बनती है जब भ्रष्टाचार के आरोप में लोगों को रंगे हाथ पकड़ा जाता है लेकिन उनके प्रति समाज में किसी प्रकार की कोई असम्मान की भावना नहीं उपजती क्योंकि समाज में रह रहे लोगों को भी यह एक साधारण सी बात लगने लगी है।
भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सरकारी नारों में इस बात का उल्लेख होता है सरकार के मुखिया और बड़े-बड़े नेता ये कहते हैं कि भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति है लेकिन उनकी नाक के नीचे ही जबरदस्त भ्रष्टाचार चलता रहता है । हाल ही में एक अधिकारी को जब रिश्वत लेते पकड़ा गया तो उसने खुले आम एक वीडियो बनाकर कहा कि मैं अकेला दोषी कहां हूं ये पैसा तो ऊपर तक जाता है उसका ये बयान सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुआ लेकिन लोगों ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की क्योंकि उन्होंने इसे नियति ही मान लिया है।
न्यायमूर्ति श्री अतुल श्रीधरन ने भ्रष्टाचार के मामले में मृत्यु दंड के प्रावधान करने पर विचार करने की बात कही है वर्तमान में भारत में मृत्युदंड केवल 'दुर्लभ से दुर्लभतम मामलों' में ही दिया जाता है। यह सजा केवल उन जघन्य अपराधियों को मिलती है, जिन्होंने अत्यंत क्रूरता से हत्या, बच्चियों के साथ बलात्कार और हत्या, या राष्ट्र के विरुद्ध युद्ध जैसे हालात पैदा किए हों मृत्युदंड को भी लेकर तमाम नियम कायदे है मृत्युदंड की सजा जब 'सत्र न्यायालय' द्वारा सुनाई जाती है, इसे लागू करने से पहले संबंधित उच्च न्यायालय की मंजूरी अनिवार्य होती है। दोषी व्यक्ति के पास सजा को चुनौती देने और सुप्रीम कोर्ट तक अपील करने का पूरा अधिकार भी होता है।सजा की पुष्टि हो जाने के बाद, अपराधी के पास राष्ट्रपति या राज्यपाल के समक्ष दया याचिका दायर करने का अंतिम विकल्प होता है।हाल के वर्षों में निचली अदालतों द्वारा मौत की सजाएं सुनाई गई हैं, लेकिन उच्च स्तर पर इनकी लंबी कानूनी समीक्षा और अपील प्रक्रिया चलती रहती है।वर्तमान भारत में मृत्यु दंड की प्रासंगिकता के अध्ययन में पहला विचार यह मानता है कि जिसने अपराध किया है उसे पीड़ा देना न्यायप्रिय है और यह पीड़ा अन्य व्यक्तियों को भी अपराध करने से रोकती है, यह सबसे कठोर आपराधिक दंड माना जाता है, जिसे सामान्यतः मृत्युदंड कहा जाता है, जिसमें अदालतें गंभीरतम अपराधों के दोषी व्यक्ति को कानूनी रूप से फाँसी की सजा सुनाती है भारत में मृत्युदंड का तात्पर्य किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति को फांसी देने की प्रथा से है और इसे सबसे क्रूर दंड माना जाता है, जब मृत्युदंड को सरकार एवं न्यायपालिका द्वारा सबसे क्रूर दंड माना जाता है तो क्या भ्रष्टाचार जैसे कृत्य के लिए इस सजा को देना उपयुक्त होगा ये भी एक सवाल है इसके अलावा ये कैसे निर्धारित होगा कि कितने और कैसे भ्रष्टाचार में ये सज़ा दी जा सकेगी? या हमारा समाज जो भ्रष्टाचार का इतना आदी हो चुका है ऐसी सजा के लिए कभी हामी भरेगा ?
बहरहाल न्यायमूर्ति श्रीअतुल श्रीधरन की ये टिप्पणी समाज शासन प्रशासन की आँखे खोलने के लिए पर्याप्त है लेकिन क्या इसे अमल में लाया जा सकता है इसका उत्तर भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है.