

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

इलाहाबाद हाई कोर्ट में एक मामले में फैसला देते हुए जस्टिस श्री अतुल श्रीधरन ने देश व्याप्त भ्रष्टाचार पर बेहद सख्त टिप्पणी की है। उप्र सरकार द्वारा बुलडोजर कार्रवाई से जुड़े मामले पर फैसला सुनाते हुए उन्होंने कहा कि अगर सरकार भ्रष्टाचार समाप्त करने के प्रति गम्भीर है तो उसे भ्रष्टाचार के दोषियों पर मृत्युदण्ड का प्रावधान करने पर विचार करना चाहिए। मुद्दा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह प्रत्येक नागरिक की रोजमर्रा की जिन्दगी से जुड़ा है और जस्टिस श्रीधरन कि तल्ख़ टिप्पणी से ऐसा प्रतीत होता है कि कि सरकार के हाथ से बात निकल चुकी है। फिर जिस देश के जघन्य अपराधों में दोषी पाए जाने वाले सजायाफ्ता को मृत्यु दण्ड देने की प्रक्रिया ही बहुत लम्बी हो वहां भ्रष्टाचार पर मौत की सजा का कानून बनाना लगभग असंभव है। एक कड़वी वास्तविकता यही है कि भ्रष्टाचार खत्म करने में सबसे बड़ी रुकावट स्वयं सरकार में इच्छाशक्ति की कमी है क्योंकि सरकारें भ्रष्टाचार के दम पर ही बनती और चलती हैं। अंधाधुंध खर्च, बाहुबल के प्रयोग और अपराधियों की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष मदद के बिना भारत में चुनाव जीतना नामुमकिन है इसलिए किसी भी राजनीतिक पार्टी अथवा सरकार से यह उम्मीद करना बेमानी है कि वह भ्रष्टाचार को खत्म करने का ईमानदार प्रयास करेगी।
आम तौर पर रिश्वत को ही भ्रष्टाचार माना जाता है लेकिन यह समझना भी जरूरी है कि सिर्फ पैसों का लेन देन ही भ्रष्टाचार नहीं बल्कि समय पर दफ्तर न पहुंचना, काम को बेवजह लटकाना, फाइलों को ठंडे बस्ते में रखना और प्रशासनिक तथा न्यायिक फैसलों में देरी करना भी उतना ही गंभीर भ्रष्टाचार है। जिन सरकारी दफ्तरों में सीधे आम जनता को सेवाएं देने की बाध्यता है वहां तो रोजमर्रा की मजबूरी पर कुछ काम होता ही है लेकिन सिर्फ फाइलों को इधर-उधर करने वाले महकमों में तो अफसर और मातहत अपनी मर्जी के मालिक होते हैं। आम जनता से सीधा संबंध न होने की वजह से तत्काल रिश्वत का कोई मौका नहीं होता इसलिए काम भी कछुआ चाल से चलता रहता है। बेशक कुछ चतुर लोग अपनी फाइलों में तेजी लाने के लिये नकद भुगतान करके काम निकाल लेते हैं लेकिन बिना रिश्वत के फाइलों पर धूल जमती रहती है।
सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि कुछ रंगे हाथों पकड़े जाने वाले मामलों के अलावा सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार का कोई सुबूत पेश करना मुश्किल है। यह बीमारी हर जगह हर स्तर पर मौजूद तो है लेकिन इसके लक्षण इसलिए छिपे रहते हैं कि इस लेन-देन में देने वाले और लेने वाले दोनों का फायदा जुड़ा होता है। बहुत से छोटे-बड़े
काम ऐसे हैं कि सिर्फ सरकार के जिम्मे हैं। पुलिस थाना, कलेक्ट्रेट, नगर पालिका, रजिस्ट्री ऑफिस, सचिवालय, रेलवे, आरटीओ आदि। जब इनसे जुड़े किसी काम में अधिकारियों के हस्ताक्षर के बिना काम बनना असंभव हो तो रिश्वत के अलावा कोई चारा नहीं बचता। इस कामों में सही गलत में सिर्फ इतना फर्क होता है कि सही काम में कम और गलत काम में ज्यादा रिश्वत देनी होती है। कभी कभार कोई पीड़ित शिकायत कर देता है तो पकड़ा-धकड़ी हो जाती है अन्यथा रिश्वत का कारोबार बदस्तूर चल रहा है और दिनों दिन फल फूल रहा है। सरकार और राजनेता कुछ भी दावा करें लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं कि इस सदी में भ्रष्टाचार में काफी ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है। हाई कोर्ट की टिप्पणी भी इस घिनौनी हक़ीक़त का पुष्टिकरण ही है।
दरअसल इस भ्रष्ट व्यवस्था की समाप्ति का इच्छुक कोई नहीं क्योंकि इसका चलन कमोबेश सबके लिए फायदेमंद है। सही काम हो या गलत, करवाने वाला खुश है कि बार-बार दफ्तरों के चक्कर नहीं काटना पड़ेगा। आला अफसर खुश हैं कि काम करके एहसान भी कर रहे हैं और मलाई भी काट रहे हैं। राजनेता भी खुश हैं कि भरपूर माल उन तक पहुँच रहा है। यह समझने के लिए किसी दिव्यदृष्टि की जरूरत नहीं। सबकी नजरों में है कि छोटे से छोटे राजनीतिक पद पर पहुंचकर नेताओं की सम्पत्ति किस तरह दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती है। इन्कम टैक्स, लोकायुक्त वगैरह के छापों में अफसरों के ठाट बाट, जमीन जायदाद और सोना चाँदी खुद अपनी कहानी कह देते हैं। बहुत से महकमों के चपरासी और बाबू भी करोड़ों उगल चुके हैं। आला अफसर तो इतने निरंकुश हो चुके हैं कि न्यायालय के आदेश मानने में भी अड़ंगा लगाते हैं। इसी का नतीजा है कि देश के न्यायालयों में अवमानना याचिकाओं का अम्बार लगा है। असलियत यही है कि भ्रष्टाचार के हमाम में सब नंगे हैं मगर सिस्टम है कि आँखें बन्द किए सुस्ता रहा है।
राजनेताओं और अफसरशाही से तो कोई उम्मीद करना दिन में सपने देखने जैसा है। अगर थोड़ी बहुत उम्मीद है तो न्यायपालिका से ही है क्योंकि न्यायालय ही देश के चौकीदार और थानेदार दोनों की भूमिका अदा करते हैं। जैसी कठोर टिप्पणी न्यायमूर्ति श्री अतुल श्रीधरन द्वारा की गई है वैसी ही कठोर न्यायपालिका की भूमिका आज के समय की माँग है। दरअसल सरकारी अफसर ही भ्रष्टाचार की धुरी हैं और जनता के पैसों को ऊपर तक पहुंचाने में पुल की भूमिका अदा करते हैं।इसलिए अगर सिर्फ अफसरशाही को नियंत्रित कर दिया जाए तो भ्रष्टाचार पर काफी रोक लगाई जा सकती है और यह काम केवल न्यायपालिका ही कर सकती है।
डॉ योगेन्द्र श्रीवास्तव
जबलपुर मप्र
yogendra.shrivastava@gmail.com