

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

High Court's significant ruling in a case of unwanted pregnancy.
बिलासपुर हाई कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़ित नाबालिगों के मामलों में एक अहम फैसला देते हुए कहा है, कि अवांछित गर्भ को जबरन ढोने के लिए मजबूर करना गरिमा और प्रजनन स्वायत्तता के खिलाफ है। कोर्ट ने 26 सप्ताह और 14 सप्ताह के दो अलग-अलग मामलों में गर्भपात की अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि इस मामले में गर्भ की अवधि ही एकमात्र आधार नहीं हो सकती। अवांछित गर्भ ढोने के लिए मजबूर करना गरिमा के खिलाफ है। मामले में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िता को बड़ी राहत दिया है। बालोद और रायपुर के मामलों में हाई कोर्ट ने मानसिक पीड़ा और स्वास्थ्य को अहम आधार माना है। यौन अपराध की शिकार नाबालिगों के अवांछित गर्भ को लेकर दोनों महत्वपूर्ण मामलों में हाई कोर्ट ने मानवीय रुख अपनाया है। एक मामले में गर्भ की अवधि 26 सप्ताह एक दिन से अधिक होने के बावजूद कोर्ट ने राहत देने से मना नहीं किया। दूसरे मामले में, 14 सप्ताह पांच दिन के गर्भ को चिकित्सकीय रूप से सुरक्षित मानते हुए गर्भपात की अनुमति दी गई।
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि दुष्कर्म के परिणामस्वरूप ठहरे अवांछित गर्भ को नाबालिग की इच्छा के विरुद्ध जारी रखने के लिए मजबूर करना उसके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। कोर्ट ने यह भी कहा कि गर्भ की अवधि ही अंतिम कसौटी नहीं हो सकती। पीड़िता की उम्र, स्वास्थ्य, मानसिक स्थिति, गर्भ का कारण और मेडिकल बोर्ड की राय जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना आवश्यक है।
आपको बता दें, कि अवैध गर्भाधान के पहला मामला बालोद जिले की नाबालिग पीड़िता का है, जिसे एबीसी के नाम से संबोधित किया गया है। उसने गर्भ समाप्त कराने के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कोर्ट के निर्देश पर सीएमएचओ, बालोद ने मेडिकल बोर्ड का गठन किया। जांच में गर्भ की अवधि 26 सप्ताह एक दिन पाई गई। बोर्ड ने सामान्य प्रावधानों के तहत गर्भपात में कठिनाई जताई, लेकिन हाई कोर्ट ने गर्भ की अवधि को अकेला निर्णायक आधार मानने से मना किया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि सोनोग्राफी से गर्भ की उम्र का आकलन अनुमान पर आधारित होता है।
ऐसा ही एक दूसरा मामला रायपुर जिले का है, जहां नाबालिग पीड़िता एक्सवाईजेड के नाम से जानी जाती है। उसके साथ यौन अपराध हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप वह गर्भवती हुई। पीड़िता ने गर्भ समाप्त कराने की अनुमति के लिए याचिका दायर की थी। मेडिकल बोर्ड ने गर्भ की अवधि 14 सप्ताह पांच दिन बताई और इसे चिकित्सकीय रूप से सुरक्षित माना।
दोनों मामलों में हाई कोर्ट ने कहा, कि बलात्कार के परिणामस्वरूप ठहरे गर्भ से होने वाली पीड़ा को कानून महिला के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर क्षति के रूप में मान्यता देता है। विशेषकर नाबालिग पीड़िता को उसकी इच्छा के विरुद्ध अवांछित गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट पीड़िता की गरिमा को सर्वोपरि मानते हुए कहा कि गर्भपात के प्रश्न को केवल गर्भावस्था की अवधि या तकनीकी कानूनी सीमा तक सीमित नहीं रखा जा सकता। नाबालिग पीड़िताओं के स्वास्थ्य, मानसिक पीड़ा और प्रजनन संबंधी निर्णय लेने की स्वायत्तता को भी न्यायिक विचार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।