

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

Impact of Middle East tensions: Hormuz crisis is making petrol and diesel more expensive, increasing pressure on India's import bill.
नई दिल्ली। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को झटका दिया है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य पर खतरा बढ़ गया है। इस मार्ग से गुजरने वाली तेल आपूर्ति प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, जिसका असर भारत जैसे बड़े आयातक देशों पर भी पड़ रहा है।
वैश्विक तेल आपूर्ति पर असर
होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के बीच स्थित एक संकरा समुद्री मार्ग है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया का करीब 20% कच्चा तेल और ईंधन इसी रास्ते से होकर गुजरता है। रोजाना लगभग 20 मिलियन बैरल से अधिक तेल यहां से ट्रांसपोर्ट होता है, जो वैश्विक समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा है।
भारत पर क्यों बढ़ रहा असर
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और अपनी जरूरत का करीब 88% कच्चा तेल आयात करता है। इसमें से लगभग आधा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता है और इसका बड़ा भाग होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते ही पहुंचता है।
इराक, सऊदी अरब, यूएई और कुवैत से भारत रोजाना लगभग 2.5–2.7 मिलियन बैरल तेल आयात करता है। क्षेत्र में संघर्ष के कारण जहाजों पर हमलों का खतरा, बीमा लागत में वृद्धि और वैकल्पिक समुद्री मार्ग अपनाने जैसी स्थितियों ने आपूर्ति को महंगा और धीमा कर दिया है।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 से 115 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत के आयात बिल पर 15–16 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
क्यों महंगा हो रहा हर तरह का फ्यूल
कच्चे तेल से पेट्रोल, डीजल, केरोसिन, एविएशन फ्यूल और एलपीजी जैसे कई ईंधन फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन प्रक्रिया से बनते हैं। रिफाइनरी में कच्चे तेल को गर्म कर अलग-अलग तापमान पर हाइड्रोकार्बन को अलग किया जाता है।
चूंकि सभी ईंधन एक ही कच्चे तेल से बनते हैं, इसलिए कच्चे तेल की आपूर्ति घटने पर सभी प्रकार के ईंधनों की कीमतें एक साथ बढ़ने लगती हैं। भारत की लगभग 60% एलपीजी और आधी प्राकृतिक गैस भी मिडिल ईस्ट से आती है, जिसका बड़ा हिस्सा होर्मुज मार्ग से गुजरता है।
भारत की रिफाइनरी क्षमता
देश में कुल 258 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष की रिफाइनिंग क्षमता है और लगभग 23 रिफाइनरियां संचालित हैं। इनमें प्रमुख योगदान इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सार्वजनिक कंपनियों का है।
निजी क्षेत्र में रिलायंस इंडस्ट्रीज की जामनगर रिफाइनरी और नायरा एनर्जी की वडीनार रिफाइनरी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके अलावा चेन्नई पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन, नुमालीगढ़ रिफाइनरी और मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड भी संचालन में शामिल हैं।
सरकार की तैयारी और चुनौतियां
सरकार ने रूस, अमेरिका और अफ्रीका से तेल आयात बढ़ाकर वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाने की कोशिश की है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अब करीब 70% आयात वैकल्पिक मार्गों से किया जा रहा है।
हालांकि देश के पास फिलहाल 20–25 दिनों का रणनीतिक तेल भंडार है, लेकिन यदि संकट लंबा चला तो ईंधन आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल महंगा होने से परिवहन लागत, खाद्य कीमतों और अन्य वस्तुओं की महंगाई भी बढ़ सकती है।