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India's education crisis...degrees without jobs and youth migrating from villages - Dr. Anurag Verma
नई दिल्ली। आज भारत एक शांत लेकिन गहरे मोड़ पर खड़ा है। एक ओर हमारे विश्वविद्यालय हर वर्ष लाखों स्नातक और स्नातकोत्तर तैयार कर रहे हैं, दूसरी ओर इन युवाओं में से बड़ी संख्या में या तो बेरोज़गार है, या अपनी योग्यता के अनुरूप काम नहीं पा रहे हैं। इसी समय, हमारे गाँव जो कभी आत्मनिर्भर सभ्यता की रीढ़ थे धीरे-धीरे अपने युवाओं को खोते जा रहे हैं। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं है। यह इस बात की संरचनात्मक विफलता है कि हम शिक्षा, काम और सम्मान को कैसे परिभाषित करते हैं।
दशकों तक हमारी शिक्षा व्यवस्था पर औपनिवेशिक सोच की छाप रही, जिसे उस समय के शासकों की जरूरत के अनुसार आकार मिला। उस समय उद्देश्य स्पष्ट कि ऐसे लोगों की एक श्रेणी तैयार करना जो प्रशासनिक और लिपिकीय कार्य कर सके। भारत ने तब से राजनीतिक और आर्थिक रूप से लंबा सफर तय किया है लेकिन शिक्षा की मूल दिशा अभी भी पूरी तरह नहीं बदली।
आज भी हम कौशल के बजाय डिग्रियों, क्षमता के बजाय प्रमाणपत्र, और स्थानीय आजीविका के बजाय शहरी नौकरियों को अधिक महत्व देते हैं और इसका परिणाम हर जगह दिखाई दे रहा है। युवा सीमित सफेदपोश नौकरियों की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं, और अक्सर अस्थिर काम में फंस जाते हैं। वहीं, ग्रामीण भारत एक विरोधाभास का सामना कर रहा है कृषि और पारंपरिक व्यवसायों में रुचि घट रही है, जबकि इन्हीं क्षेत्रों में श्रम की कमी और ठहराव बढ़ रहा है।
दरअसल ऐसा हमेशा नहीं था। भारत के गाँव कभी सशक्त और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्थाएँ थे। कृषि केवल जीविका नहीं, बल्कि पीढ़ियों से विकसित एक विज्ञान थी। बुनाई, बढ़ईगीरी, मिट्टी के बर्तन, धातु कार्य जैसे शिल्प न केवल पहचान बल्कि आय का स्रोत थे। समुदाय आपस में जुड़े हुए थे और आजीविका स्थानीय स्तर पर ही आधारित थी। गुरुकुल की परंपरा, जिसे हम केवल शिक्षा से जोड़ते हैं, वास्तव में एक व्यापक दर्शन थी जहाँ शिक्षा जीवन, प्रकृति और जिम्मेदारी से जुड़ी हुई थी।
दुनिया के अन्य हिस्सों में भी ऐसे ही मॉडल थे, सामुदायिक खेती से लेकर हाथों की कारीगरी तक। ये व्यवस्थाएँ पिछड़ी नहीं थीं; बल्कि टिकाऊ, कौशल-आधारित और संतुलित थीं।आज विडंबना यह है कि दुनिया वही चीज़ें फिर से खोज रही है, जिन्हें हमने पीछे छोड़ दिया स्थानीय उत्पादन, पारिस्थितिक संतुलन और कौशल आधारित अर्थव्यवस्था। भारत को आधुनिकता से पीछे नहीं जाना है, बल्कि असंतुलन को सुधारना है।
इस समस्या का कोई जादुई समाधान नहीं है। इसके लिए पूरे सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से प्रयास करना होगा। पहला, शिक्षा को केवल साक्षरता नहीं, बल्कि आजीविका से जोड़ना होगा। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूलों को कृषि विज्ञान, खाद्य प्रसंस्करण, मरम्मत कार्य, डिजिटल साक्षरता और छोटे व्यवसाय प्रबंधन जैसे व्यावहारिक कौशल सिखाने चाहिए। इस दिशा में संकेत देती है, लेकिन इसकी असली परीक्षा गाँवों में प्रभावी क्रियान्वयन में है।
दूसरा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को केवल कच्चे उत्पादन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। किसानों और स्थानीय उत्पादकों को प्रसंस्करण, पैकेजिंग और सीधे बाज़ार तक पहुँच में सक्षम बनाना होगा। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से एक छोटा ग्रामीण उद्यम भी राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर तक पहुँच सकता है। सिद्धांत सरल है स्थानीय उत्पादन, व्यापक बाज़ार।
तीसरा, ग्रामीण कार्यों को सम्मान देना होगा। एक कुशल किसान, डेयरी संचालक, कारीगर या तकनीशियन कोई विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्र की मजबूती के केंद्र हैं। इनके बिना खाद्य सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला और स्थानीय अर्थव्यवस्था कमजोर हो जाती है।
अंत में, हमें एक असहज सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि हर शिक्षित युवा को पारंपरिक दफ्तर की नौकरी नहीं मिलेगी, और न ही सभी को उसी दिशा में जाना चाहिए। एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था में विविध भूमिकाएँ आवश्यक होती हैं, जिनमें से कई शहरी कॉर्पोरेट ढाँचे से बाहर होती हैं।
इसलिए चुनौती केवल बेरोज़गारी की नहीं है बल्कि गलत दिशा में बनी आकांक्षाओं और अपेक्षाओं की है। यदि शिक्षा ऐसे आसान नौकरी के पीछे दौड़ने वाले तैयार करती रहेगी जिनके लिए पर्याप्त नौकरियाँ नहीं हैं, और उन कौशलों की उपेक्षा करती रहेगी जो वास्तविक अर्थव्यवस्था को चलाते हैं, तो यह अंतर और बढ़ेगा। लेकिन यदि हम शिक्षा को आजीविका विशेषकर ग्रामीण भारत से जोड़ दें, तो यह संकट एक अवसर में बदल सकता है।
भारत का भविष्य केवल उसके शहरों, स्टार्टअप्स या कॉर्पोरेट गलियारों में सुरक्षित नहीं होगा। यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि क्या उसके गाँव फिर से सम्मानजनक कार्य, टिकाऊ जीवन और आर्थिक सशक्तता के केंद्र बन पाते हैं। शिक्षा का उद्देश्य बदलना होगा जो ग्रामीण युवाओं को गाँव छोड़ने का साधन नहीं बल्कि गाँव को बदलने की शक्ति प्रदान करे। तभी भारत केवल डिग्रीधारी नहीं, बल्कि एक संतुलित और आत्मनिर्भर राष्ट्र का निर्माण करने वाले नागरिक तैयार कर पाएगा।