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Major Supreme Court ruling: A permanent government employee cannot be dismissed without a departmental inquiry.
नई दिल्ली। सरकारी कर्मचारियों की सेवा सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि सेवा में पक्के (कन्फर्म) हो चुके किसी भी सरकारी कर्मचारी को बिना विभागीय जांच के नौकरी से नहीं हटाया जा सकता। अदालत ने कहा कि नियुक्ति अवैध या अनियमित होने का आरोप होने पर भी संविधान के अनुच्छेद 311(2) के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने ओडिशा के जगतसिंहपुर जिला एवं सत्र न्यायालय में नियुक्त जूनियर क्लर्क-कम-कॉपीस्ट कर्मचारियों की बहाली का आदेश दिया। इन कर्मचारियों की सेवाएं पहले नियमित और बाद में स्थायी कर दी गई थीं।
प्रशासन का आरोप था कि नियुक्तियां विज्ञापन में घोषित पदों से अधिक रिक्तियों पर की गई थीं। बाद में इन पदों को अस्तित्वहीन बताते हुए नियुक्तियों को शुरू से ही अवैध मान लिया गया और कर्मचारियों को केवल कारण बताओ नोटिस देकर बिना विभागीय जांच के सेवा से हटा दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी कर्मचारी की सेवा की पुष्टि केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं होती, बल्कि इससे उसे नौकरी की सुरक्षा और संवैधानिक संरक्षण प्राप्त होता है। अदालत ने कहा कि कर्मचारी की भूमिका, आरोपों की जांच और बर्खास्तगी जैसे गंभीर निर्णय विभागीय जांच की प्रक्रिया के माध्यम से ही तय किए जाने चाहिए।
पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 311(2) के अनुसार किसी भी सरकारी कर्मचारी को हटाने से पहले उसके खिलाफ आरोपों की जानकारी देना और अपना पक्ष रखने का उचित अवसर प्रदान करना अनिवार्य है। अदालत ने कहा कि यह मामला उन अपवादों में नहीं आता, जहां विभागीय जांच से छूट दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों की बर्खास्तगी को असंवैधानिक करार देते हुए उनकी बहाली का आदेश दिया। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि प्रशासन उचित कानूनी प्रक्रिया और विभागीय जांच का पालन करता है, तो वह कानून के अनुसार नए सिरे से कार्रवाई कर सकता है।