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Questions raised over ₹190 crore medicine purchase; management under fire over CGMSC's decisions.
रायपुर। छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेज कॉरपोरेशन (सीजीएमएससी) की करीब 190 करोड़ रुपये की दवा खरीद एक बार फिर विवादों में आ गई है। आरोप है कि अमानक गुणवत्ता वाली पैरासिटामोल समेत कई दवाओं के मामले में कंपनी को कारण बताओ नोटिस जारी होने के बावजूद उसके खिलाफ तय नियमों के अनुसार कार्रवाई नहीं की गई। इस पूरे घटनाक्रम ने खरीद प्रक्रिया और निर्णयों की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रिकॉर्ड और कंपनी के जवाब में विरोधाभास
मामले में सीजीएमएससी ने संबंधित कंपनी को कारण बताओ नोटिस जारी कर जिन दवा बैचों का उल्लेख किया, उनके निर्माता और बैच नंबर का स्पष्ट विवरण दर्ज किया गया था। हालांकि कंपनी ने अपने जवाब में दावा किया कि विवादित बैच उसके नहीं हैं। इसके बावजूद उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर बाद में उन्हीं बैचों की दोबारा आपूर्ति होने की बात सामने आने से पूरे मामले पर नए सवाल उठ गए हैं।
दवा बदलने के बाद भी कार्रवाई नहीं
आरोप है कि कंपनी ने पहले एक अन्य बैच की आपूर्ति की और बाद में विवादित बैच बदलकर नई खेप उपलब्ध कराने की बात स्वीकार की। इसके बाद भी सीजीएमएससी ने कंपनी के खिलाफ ब्लैकलिस्टिंग, वित्तीय दंड या अन्य अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की। यही फैसला अब जांच के दायरे में बताया जा रहा है।
अन्य दवाओं की गुणवत्ता पर भी शिकायतें
रिपोर्ट के अनुसार केवल पैरासिटामोल ही नहीं, बल्कि मल्टीविटामिन कैप्सूल, डायइथाइलकार्बामाजिन टैबलेट और एमोक्सीसिलिन-क्लैवुलैनिक एसिड इंजेक्शन सहित कई दवाओं की गुणवत्ता को लेकर भी शिकायतें दर्ज हुई थीं। कुछ मामलों में संबंधित बैचों का वितरण रोकने का निर्णय लिया गया, लेकिन आगे की कार्रवाई को लेकर सवाल बने हुए हैं।
नियम क्या कहते हैं
खरीद नियमों के मुताबिक यदि किसी दवा का बैच प्रयोगशाला जांच में अमानक पाया जाता है तो निर्धारित अवधि के भीतर उसे पूरी मात्रा में बदलना होता है। साथ ही संबंधित कंपनी पर आर्थिक दंड लगाने और बार-बार गुणवत्ता संबंधी शिकायत मिलने पर ब्लैकलिस्ट करने का भी प्रावधान है। ऐसे में कार्रवाई नहीं होने पर प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
प्रबंधन ने जांच की बात कही
सीजीएमएससी के अध्यक्ष दीपक मरकाम ने मामले पर कहा कि उन्हें इस प्रकरण की पूरी जानकारी नहीं है। उन्होंने कहा कि संबंधित अधिकारियों से जानकारी लेकर पूरे मामले की जांच कराई जाएगी और तथ्यों के आधार पर आवश्यक निर्णय लिया जाएगा।
पारदर्शिता पर उठे गंभीर सवाल
दवा खरीद और गुणवत्ता नियंत्रण से जुड़े इस मामले ने सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी प्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सार्वजनिक धन से खरीदी जाने वाली दवाओं में गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए और यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।