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Situation worsens in Nepal tragedy... thousands still missing after eight days... rain and swollen rivers halt rescue operations.
काठमांडू। नेपाल में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के आठ दिन बाद भी हालात सामान्य नहीं हो पाए हैं। त्रासदी में मृतकों की संख्या बढ़कर 1,243 हो गई है, जबकि 4,875 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। राहत और बचाव दल लगातार लोगों की तलाश में जुटे हैं, लेकिन लगातार हो रही बारिश ने अभियान की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।रसुवा और नुवाकोट समेत कई इलाकों में खराब मौसम के कारण बचाव कार्य प्रभावित हुआ है। जल तथा मौसम विज्ञान विभाग के मुताबिक 2 सितंबर सुबह तक सिंधुली की सुनकोशी, गोरखा की बूढ़ी गंडकी और दादेलधुरा की महाकाली नदी खतरे के स्तर पर बह रही थीं।
रातभर हुई बारिश से कई हाइड्रो पावर परियोजनाओं की सुरंगों में पानी भर गया। राष्ट्रीय आपदा जोखिम न्यूनीकरण एवं प्रबंधन प्राधिकरण के कार्यकारी प्रमुख धर्मराज उप्रेती के अनुसार, इससे परियोजनाओं के आसपास चल रहे तलाशी और बचाव अभियान में अतिरिक्त चुनौतियां पैदा हुई हैं।दुर्गम इलाकों में लगातार बदलते मौसम और नदी के बढ़ते जलस्तर के कारण राहत टीमों को सुरक्षित तरीके से आगे बढ़ने में परेशानी हो रही है।
त्रासदी के बीच कई परिवारों का दर्द बेहद मार्मिक तस्वीरों के रूप में सामने आ रहा है। काठमांडू में एक लापता युवक के परिजनों ने शव नहीं मिलने के बाद उसके पुतले को तैयार कर अंतिम संस्कार किया। परिवार के लिए यह भावनात्मक रूप से बेहद कठिन क्षण रहा, क्योंकि लंबे इंतजार के बाद भी युवक का कोई पता नहीं चल सका।
आपदा से नेपाल की अर्थव्यवस्था पर भी बड़ा असर पड़ने की आशंका है। प्रारंभिक अनुमान के अनुसार करीब 5 अरब डॉलर यानी लगभग 42 हजार करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है। यह नेपाल की सालाना जीडीपी के करीब 10 प्रतिशत के बराबर बताया जा रहा है।पहले से कर्ज के दबाव से जूझ रहे नेपाल के सामने अब बड़े पैमाने पर पुनर्निर्माण की चुनौती है। पिछले 11 वर्षों में देश का कर्ज जीडीपी के करीब 26 प्रतिशत से बढ़कर 45 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। ऐसे में आपदा के बाद बुनियादी ढांचे को दोबारा खड़ा करना सरकार के लिए कठिन परीक्षा साबित हो सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का प्रभाव लगातार गंभीर हो रहा है। बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इससे अचानक बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी घटनाओं का खतरा बढ़ रहा है।वर्ष 2000 के बाद हिमालयी क्षेत्र में बर्फ पिघलने की गति तेज होने की बात सामने आई है। इसका असर जलस्तर और पहाड़ी इलाकों की स्थिरता पर पड़ रहा है। नेपाल की मौजूदा त्रासदी ने एक बार फिर इस क्षेत्र में बदलते मौसम और बढ़ते प्राकृतिक जोखिमों को लेकर गंभीर चिंता खड़ी कर दी है।