

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

Supreme Court issues strong message on hate speech: Laws exist, but enforcement is lacking; court issues a major warning
नई दिल्ली। नफरती भाषण पर रोक लगाने के लिए अतिरिक्त दिशा निर्देश जारी करने की मांग को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। अदालत ने साफ कहा कि देश में इस तरह के मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त कानून मौजूद हैं, असली समस्या उनके सही तरीके से लागू न होने की है।
कानून की कमी नहीं, अमल की कमी असली समस्या सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि नफरती भाषण रोकने के लिए किसी नए कानून या अतिरिक्त दिशा निर्देश की जरूरत नहीं है।अदालत ने स्पष्ट किया कि मौजूदा आपराधिक कानून ढांचा धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने, दुश्मनी फैलाने और सार्वजनिक शांति भंग करने जैसे मामलों से निपटने के लिए पर्याप्त है।
कार्यपालिका को आईना पुलिस की जिम्मेदारी पर कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समस्या कानून की कमी नहीं बल्कि उसके सही तरीके से लागू न होने की है। अदालत ने कार्यपालिका को आईना दिखाते हुए कहा कि कई मामलों में पुलिस अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रहती है।कोर्ट ने यह भी दोहराया कि संज्ञेय अपराध का पता चलने पर एफआईआर दर्ज करना पुलिस का अनिवार्य कर्तव्य है।
अदालत कानून नहीं बना सकती सिर्फ व्याख्या कर सकती है
अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक अदालतें कानून की व्याख्या कर सकती हैं और मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए निर्देश दे सकती हैं, लेकिन वे नए कानून नहीं बना सकतीं और न ही विधायिका को ऐसा करने के लिए बाध्य कर सकती हैं।
नफरती भाषण और सामाजिक संतुलन संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा मुद्दा
अदालत ने कहा कि नफरती भाषण, अफवाह फैलाना और सामाजिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाना सीधे तौर पर संविधान में दिए गए भाईचारे, गरिमा और शांति जैसे मूल्यों से जुड़ा मामला है।
सरकार और विधायिका के लिए खुला रास्ता नीति सुधार की संभावना पर संकेत
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार और संबंधित विधायी संस्थाएं चाहें तो समाज की बदलती जरूरतों के अनुसार कानून में सुधार या विधि आयोग की 2017 की सिफारिशों पर विचार कर सकती हैं।