

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

Supreme Court's strict comment on religious institutions: Rules are necessary, arbitrariness will not be allowed
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ शब्दों में कहा है कि किसी भी धार्मिक संस्था का प्रबंधन बिना नियमों के नहीं चल सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब यह नहीं है कि संस्थाओं में अराजकता फैलने दी जाए। हर व्यवस्था के संचालन के लिए स्पष्ट ढांचा और नियम अनिवार्य हैं।
महिलाओं के अधिकार और धार्मिक परंपराओं पर सुनवाई के दौरान अहम टिप्पणी
यह टिप्पणी उस समय सामने आई जब अदालत विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी, जिनमें धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं। इन मामलों में सबरीमाला मंदिर जैसे संवेदनशील मुद्दे भी चर्चा के केंद्र में हैं।
संविधान पीठ ने दिया स्पष्ट संकेत, व्यवस्था से ही चलता है संस्थान
नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि प्रबंधन का अधिकार असीमित नहीं हो सकता। अदालत ने दो टूक कहा कि बिना किसी संरचना के संस्थाओं का संचालन संभव नहीं है। इसलिए हर धार्मिक स्थल के लिए स्पष्ट नियम और कार्यप्रणाली होना जरूरी है।
दरगाह और सूफी परंपरा पर भी हुई विस्तृत बहस
सुनवाई के दौरान हजरत ख्वाजा निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से जुड़े पक्ष की ओर से भी दलीलें रखी गईं। वकील ने बताया कि दरगाह केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सूफी परंपरा में आस्था का केंद्र होती है। उन्होंने चिश्ती परंपरा का हवाला देते हुए कहा कि यहां धार्मिक व्यवस्थाएं विशेष मान्यताओं पर आधारित होती हैं।हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि चाहे कोई भी परंपरा हो, उसके संचालन में नियमों की अनदेखी नहीं की जा सकती।
आरटीई पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: गरीब बच्चों को दाखिला देना होगा अनिवार्य
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षा के अधिकार को लेकर भी बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि निजी स्कूलों को सरकार द्वारा भेजे गए बच्चों को प्रवेश देने से इनकार करने का अधिकार नहीं है।
स्कूलों की जिम्मेदारी तय, कानून का पालन करना होगा अनिवार्य
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरटीई कानून के तहत यह स्कूलों की कानूनी जिम्मेदारी है कि वे आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को मुफ्त शिक्षा दें। अदालत ने लखनऊ के एक निजी स्कूल की अपील खारिज करते हुए हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।
शिक्षा का अधिकार केवल कागज पर नहीं, जमीनी स्तर पर दिखना चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि आरटीई कानून को उसकी मूल भावना के अनुसार लागू नहीं किया गया, तो शिक्षा का अधिकार केवल एक औपचारिक वादा बनकर रह जाएगा। अदालत ने इसे एक राष्ट्रीय मिशन के रूप में देखने की जरूरत पर जोर दिया।
स्पष्ट संदेश: अधिकारों के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी
दोनों मामलों में सुप्रीम कोर्ट का रुख साफ है कि चाहे धार्मिक स्वतंत्रता हो या शिक्षा का अधिकार, हर अधिकार के साथ नियम और जिम्मेदारी जुड़ी होती है। बिना व्यवस्था के कोई भी प्रणाली लंबे समय तक नहीं चल सकती।