

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

The Calcutta High Court stated that an Aadhaar card does not establish ownership rights but serves as prima facie evidence of possession.
कोलकाता। कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड किसी संपत्ति के स्वामित्व या स्थायी निवास का अंतिम प्रमाण नहीं है, लेकिन यह किसी व्यक्ति के कब्जे (Possession) का प्रथमदृष्टया साक्ष्य माना जा सकता है। अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक परिसर से बेदखल करने या मकान ध्वस्त करने से पहले लोक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है।
जस्टिस सब्यसाची भट्टाचार्य और जस्टिस सुप्रतिम भट्टाचार्य की खंडपीठ ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट (पूर्व में कलकत्ता पोर्ट ट्रस्ट) को निर्देश दिया कि वह कोलकाता के गार्डन रीच स्थित सीडीएलबी और सीपीटी आवासों में रहने वाले लोगों को बिना वैधानिक नोटिस और सुनवाई का अवसर दिए न तो बेदखल करे और न ही मकानों को ध्वस्त करे।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि प्राधिकरण द्वारा चलाया जा रहा ध्वस्तीकरण अभियान कानून के विपरीत है और इसे तत्काल रोका जाना चाहिए।
मामले में अपीलकर्ताओं ने पोर्ट प्राधिकरण के ध्वस्तीकरण अभियान को चुनौती दी थी। इससे पहले हाईकोर्ट की एकल पीठ ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि वे संबंधित परिसर में रहने का वैध अधिकार साबित नहीं कर सके और आधार कार्ड जैसे दस्तावेज पर्याप्त नहीं हैं। खंडपीठ ने इस आदेश को रद्द करते हुए कहा कि प्रथमदृष्टया कब्जे के साक्ष्य और अंतिम स्वामित्व प्रमाण में स्पष्ट अंतर है।
अपीलकर्ताओं ने अदालत में आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और गैस कनेक्शन के दस्तावेज प्रस्तुत कर दावा किया कि वे लंबे समय से संबंधित परिसर में रह रहे हैं। कोर्ट ने माना कि ये दस्तावेज यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि वे परिसर पर वास्तविक कब्जे में थे। अदालत ने कहा कि यदि आधार कार्ड स्वामित्व का अंतिम प्रमाण नहीं है, तब भी इसे कब्जे के प्रथमदृष्टया प्रमाण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 की धारा 4 और 5 के तहत बेदखली से पहले दो चरणों की प्रक्रिया अपनाना आवश्यक है।
पहले एस्टेट अधिकारी कारण बताओ नोटिस जारी करेगा। संबंधित व्यक्ति को जवाब देने, साक्ष्य प्रस्तुत करने और व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर दिया जाएगा।
इसके बाद ही बेदखली का आदेश पारित किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल अनधिकृत कब्जाधारी मान लेने से उसके वैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते।
पोर्ट प्राधिकरण ने तर्क दिया था कि भवन जर्जर हैं, इसलिए तत्काल ध्वस्तीकरण जरूरी है। अदालत ने इस दलील को भी खारिज करते हुए कहा कि लोक परिसर अधिनियम पोर्ट प्राधिकरण को केवल जर्जर होने के आधार पर भवन गिराने का अधिकार नहीं देता।
यदि भवन वास्तव में खतरनाक स्थिति में हैं तो संबंधित नगर निकाय लागू कानूनों के तहत कार्रवाई कर सकते हैं, लेकिन पोर्ट प्राधिकरण सीधे ध्वस्तीकरण नहीं कर सकता।
सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पोर्ट प्राधिकरण के रिकॉर्ड में स्वयं इस परिसर के 502 आवासों में लगभग 8,000 लोगों के रहने का उल्लेख है। इसके बावजूद किसी भी निवासी को अधिनियम के तहत नोटिस जारी किए जाने का रिकॉर्ड पेश नहीं किया गया। कथित सार्वजनिक नोटिस चस्पा करने के भी पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिले।
हाईकोर्ट ने माना कि बिना नोटिस और सुनवाई के ध्वस्तीकरण तथा बेदखली की कार्रवाई प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और कानून दोनों का उल्लंघन है। अदालत ने फिलहाल पोर्ट प्राधिकरण को किसी भी प्रकार की बेदखली या ध्वस्तीकरण की कार्रवाई से रोक दिया।
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि प्राधिकरण चाहे तो लोक परिसर (अनधिकृत कब्जाधारियों की बेदखली) अधिनियम, 1971 की धारा 4 और 5 के तहत पूरी कानूनी प्रक्रिया अपनाकर नई कार्रवाई कर सकता है।