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The Supreme Court issued a significant message regarding the rights of rape victims, highlighting the need for changes to abortion laws.
नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि दुष्कर्म के कारण गर्भवती हुई नाबालिग को गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने साफ संकेत दिए हैं कि ऐसे मामलों में महिला की इच्छा और मानसिक स्थिति को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
समय सीमा पर सवाल: क्या 20 सप्ताह की बाध्यता खत्म होनी चाहिए?
कोर्ट ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि गर्भपात कानून में संशोधन पर विचार किया जाए, ताकि दुष्कर्म से हुई गर्भावस्था में 20 सप्ताह की तय सीमा बाधक न बने। अदालत का मानना है कि कानून को समय के साथ लचीला बनाना जरूरी है, ताकि पीड़िताओं को न्याय मिल सके।
नाबालिग की पीड़ा को प्राथमिकता देने पर जोर
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि अजन्मे बच्चे की चिंता के साथ-साथ उस बच्ची के दर्द को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिसने गंभीर मानसिक और शारीरिक आघात सहा है। अदालत ने कहा कि ऐसी पीड़िता को जबरन मां बनने के लिए बाध्य करना उसके अधिकारों का उल्लंघन होगा।
AIIMS की आपत्ति खारिज, फैसले का अधिकार पीड़िता के पास
अदालत ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि चिकित्सा विशेषज्ञ सलाह दे सकते हैं, लेकिन अंतिम निर्णय पीड़िता और उसके परिवार का होना चाहिए। डॉक्टर या संस्थान मरीज की इच्छा के खिलाफ निर्णय नहीं ले सकते।
तेजी से सुनवाई की भी जरूरत बताई
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे संवेदनशील मामलों की सुनवाई लंबी नहीं खिंचनी चाहिए। एक सप्ताह के भीतर मामलों का निपटारा करने की व्यवस्था पर भी विचार किया जाना चाहिए, ताकि पीड़िता को मानसिक तनाव से बचाया जा सके।
प्रजनन स्वायत्तता को बताया सबसे बड़ा अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में महिला की ‘प्रजनन स्वायत्तता’ को सबसे अहम बताया। अदालत का स्पष्ट संदेश है कि किसी भी परिस्थिति में महिला की इच्छा के खिलाफ उसे गर्भ जारी रखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
क्या बदल सकता है आने वाला कानून?
इस टिप्पणी के बाद अब उम्मीद जताई जा रही है कि केंद्र सरकार गर्भपात से जुड़े कानूनों में संशोधन पर विचार कर सकती है, जिससे दुष्कर्म पीड़िताओं को अधिक राहत और न्याय मिल सके।