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Three major High Court rulings: Clear messages on Arya Samaj marriages, government delays, and the Bhilai Corporation dispute.
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केवल आर्य समाज मंदिर से जारी विवाह प्रमाण-पत्र और शुद्धि प्रमाण-पत्र के आधार पर किसी विवाह को कानूनी रूप से वैध नहीं माना जा सकता। यदि विवाह कानून के तय प्रावधानों और आवश्यक प्रक्रियाओं के अनुरूप संपन्न नहीं हुआ है, तो ऐसे संबंध को वैध वैवाहिक दर्जा नहीं मिलेगा और महिला भरण-पोषण की हकदार भी नहीं होगी।
मामला शायना परवीन उर्फ राधिका सुमन की याचिका से जुड़ा था। महिला ने दावा किया कि 15 जून 2017 को रायपुर स्थित आर्य समाज मंदिर में घनश्याम सुमन से वैदिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था। विवाह से पहले उसने शुद्धि संस्कार के जरिए वैदिक धर्म अपनाने की बात भी कही।याचिका में महिला ने आरोप लगाया कि शादी के लगभग तीन वर्ष बाद उसे कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो गई। इसके बाद पति ने इलाज का खर्च उठाने से बचने के लिए उसे मायके छोड़ दिया और बाद में दूसरी शादी कर ली।वहीं, घनश्याम सुमन ने अदालत में कहा कि दोनों के बीच कभी वैध विवाह हुआ ही नहीं। उन्होंने यह भी बताया कि महिला के इलाज के लिए करीब 12 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी गई थी और अब उस पर दबाव बनाकर ब्लैकमेल करने की कोशिश की जा रही है।
मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने मनेंद्रगढ़ फैमिली कोर्ट के 19 मई 2026 के आदेश को सही माना और महिला की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि केवल शुद्धि और विवाह प्रमाण-पत्र पेश कर देने से विवाह स्वतः वैध नहीं हो जाता। विवाह की वैधता के लिए संबंधित कानूनों के तहत निर्धारित सभी आवश्यक शर्तों और प्रक्रियाओं का पालन होना जरूरी है।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने सरकारी विभागों की कानूनी मामलों में लापरवाही पर भी कड़ी टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार की दो रिट अपीलें खारिज कर दीं। दोनों मामलों में अपील निर्धारित समय सीमा के काफी बाद दायर की गई थी।उच्च शिक्षा विभाग से जुड़े मामलों में एकलपीठ के 20 अगस्त 2024 के फैसलों को चुनौती देने वाली एक अपील 586 दिन और दूसरी 583 दिन की देरी से दायर की गई थी।सरकार की ओर से दलील दी गई कि विभागीय प्रक्रिया और फाइलों के लंबे आवागमन के कारण देरी हुई। हालांकि डिवीजन बेंच ने इस तर्क को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया।
हाई कोर्ट ने कहा कि सरकारी विभागों को केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का हवाला देकर विलंब माफी का विशेष अधिकार नहीं मिल सकता। अदालत ने राज्य सरकार को अपनी कानूनी व्यवस्था मजबूत करने, मामलों का समय पर संचालन सुनिश्चित करने और अनावश्यक देरी के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर जुर्माना लगाने के निर्देश दिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करने वाले नागरिकों की पीड़ा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
हाई कोर्ट ने भिलाई नगर निगम के आयुक्त राजीव पांडेय को पद से हटाने की मांग वाली याचिका भी खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र में बहुमत का महत्व जरूर है, लेकिन उससे ऊपर कानून और निर्धारित प्रक्रिया होती है।अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी प्रस्ताव को वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना पारित किया गया है, तो केवल बहुमत के आधार पर उसे लागू नहीं कराया जा सकता।
जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकलपीठ ने कहा कि सामान्य सभा की पूर्व सूचना और आधिकारिक एजेंडे में आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव शामिल नहीं था। ऐसे में बैठक में पारित किया गया प्रस्ताव शुरुआत से ही अवैध माना जाएगा और उसके आधार पर राज्य सरकार को कार्रवाई करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।इस मामले में भिलाई नगर निगम के पार्षद संदीप निरंकारी, आदित्य सिंह समेत 32 निर्वाचित पार्षदों ने याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि आयुक्त राजीव पांडेय मेयर-इन-काउंसिल और सामान्य सभा की स्वीकृति के बिना वित्तीय और प्रशासनिक फैसले ले रहे हैं। इसी आधार पर उन्हें पद से हटाने की मांग की गई थी, जिसे हाई कोर्ट ने अस्वीकार कर दिया।