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Trump's big bet on drugs in the US poses a new challenge for Indian pharma companies, but the story isn't that simple.
वॉशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जेनेरिक दवाओं के आयात को लेकर बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका में बिकने वाली आयातित जेनेरिक दवाओं पर चरणबद्ध तरीके से भारी टैरिफ लगाया जाएगा। इस फैसले का सबसे बड़ा असर भारत पर पड़ सकता है, क्योंकि अमेरिका अपनी बड़ी दवा जरूरत भारतीय कंपनियों से पूरी करता है।
ट्रम्प की घोषणा के अनुसार नई व्यवस्था 1 अगस्त 2026 से लागू होगी। शुरुआती दो वर्षों तक कोई अतिरिक्त टैरिफ नहीं लगाया जाएगा। इसके बाद तीसरे वर्ष 100 प्रतिशत और चौथे वर्ष 200 प्रतिशत टैरिफ लागू करने की योजना है।इसके साथ ही उन कंपनियों पर अतिरिक्त कार्रवाई की भी बात कही गई है जो तय समय के भीतर अमेरिका में उत्पादन इकाई स्थापित नहीं करेंगी।
भारत दुनिया के सबसे बड़े जेनेरिक दवा उत्पादकों में शामिल है। वर्ष 2025 में भारत ने अमेरिका को लगभग 93,644 करोड़ रुपये की दवाएं निर्यात की थीं। यह भारत के कुल वैश्विक फार्मा निर्यात का करीब 38 प्रतिशत हिस्सा है। यदि भविष्य में प्रस्तावित टैरिफ लागू होता है तो भारतीय दवा कंपनियों के लिए अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा कठिन हो सकती है।
ट्रम्प के बयान के बाद भारतीय शेयर बाजार में फार्मा कंपनियों के शेयरों पर दबाव देखने को मिला। सन फार्मा, ल्यूपिन और डॉ. रेड्डीज जैसी प्रमुख कंपनियों के शेयरों में गिरावट दर्ज की गई। कारोबार के अंत में सेंसेक्स 720 अंक और निफ्टी 191 अंक नीचे बंद हुए।
भारतीय जेनेरिक दवाओं की सबसे बड़ी ताकत उनकी गुणवत्ता और कम कीमत है। अमेरिका में ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, कैंसर, संक्रमण और मानसिक स्वास्थ्य जैसी बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली लगभग 47 प्रतिशत जेनेरिक दवाएं भारत से आती हैं।भारतीय दवाएं कई मामलों में अमेरिकी ब्रांडेड दवाओं की तुलना में 10 गुना तक सस्ती मानी जाती हैं, इसलिए वे मरीजों और स्वास्थ्य बीमा कंपनियों दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
अमेरिकी बाजार में भारत की कई बड़ी फार्मा कंपनियां सक्रिय हैं। इनमें सन फार्मा, डॉ. रेड्डीज, सिप्ला, ल्यूपिन, जायडस और ऑरोबिंदो फार्मा प्रमुख हैं। इन कंपनियों की अमेरिका में 40 से अधिक एफडीए स्वीकृत विनिर्माण इकाइयां भी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि प्रस्तावित 200 प्रतिशत टैरिफ तत्काल लागू नहीं होगा। इसकी समयसीमा कई वर्षों में तय की गई है और इस दौरान अमेरिका में राजनीतिक परिस्थितियां भी बदल सकती हैं।विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि अमेरिका भारतीय जेनेरिक दवाओं पर काफी हद तक निर्भर है। यदि आयात महंगा होता है तो सबसे बड़ा असर अमेरिकी मरीजों, स्वास्थ्य बीमा कंपनियों और दवा कीमतों पर पड़ेगा। इससे अमेरिका में महंगाई बढ़ने की आशंका भी रहेगी।
वरिष्ठ राजनयिक के. पी. फाबियान का मानना है कि भारतीय कंपनियों को फिलहाल जल्दबाजी में अमेरिका में बड़े निवेश का फैसला नहीं लेना चाहिए। उनके अनुसार व्यापार समझौते पर बातचीत जारी है और भविष्य में नीतियों में बदलाव की संभावना बनी रह सकती है।उनका कहना है कि यह घोषणा अमेरिकी राजनीति और रोजगार सृजन के संदेश से भी जुड़ी हो सकती है, जबकि व्यावहारिक रूप से अमेरिका अभी भी भारतीय जेनेरिक दवाओं पर काफी निर्भर है।