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US-Russia Sanctions: Trump administration shifts stance on sanctions against Russia; claim made that the threat of a 100% tariff on India has been averted.
नई दिल्ली। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के रूस से जुड़े प्रतिबंधों को लेकर लिए गए फैसले ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और ऊर्जा बाजार में नई चर्चा छेड़ दी है। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर सख्त शुल्क लगाने की संभावनाओं के बीच ट्रंप प्रशासन की ओर से कुछ प्रतिबंधात्मक प्रावधानों में राहत दिए जाने की बात सामने आई है। इससे भारत और चीन जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए जाने की आशंका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।इस घटनाक्रम के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो और वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने राष्ट्रपति के फैसले का बचाव किया। दोनों मंत्रियों ने ऊर्जा बाजार की मौजूदा परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ने वाले प्रभावों का हवाला दिया। साथ ही भारत की ऊर्जा जरूरतों और यूरोपीय देशों के रुख को लेकर भी बयान दिए।
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी सीनेट से पारित 'लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम, 2026' में रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने के साथ उन देशों पर भारी टैरिफ लगाने का प्रावधान शामिल है, जो रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदते हैं। इस व्यवस्था के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति को कुछ परिस्थितियों में रूस के ऊर्जा कारोबार से जुड़े देशों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क लगाने का अधिकार दिया जा सकता है। कुछ रूसी उत्पादों पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान भी चर्चा में रहा है।भारत और चीन रूस से तेल खरीदने वाले प्रमुख देशों में शामिल हैं। ऐसे में प्रस्तावित प्रतिबंधों का असर दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों और ऊर्जा आयात की लागत पर पड़ सकता था।हालांकि, किसी कानून में टैरिफ लगाने का प्रावधान होना और वास्तव में किसी देश पर शुल्क लागू किया जाना अलग-अलग बातें हैं। संबंधित आदेशों की शर्तें और लागू छूट यह निर्धारित करती हैं कि किन देशों या उत्पादों पर कार्रवाई होगी।
रूस से जुड़े प्रतिबंधों के कुछ प्रावधानों में राहत दिए जाने के बाद अमेरिकी प्रशासन ने आर्थिक प्रभावों की समीक्षा को फैसले का आधार बताया। विदेश मंत्री मार्को रुबियो के मुताबिक, प्रशासन को यह आकलन करने के लिए समय चाहिए कि रूस पर प्रतिबंधों और अन्य देशों पर टैरिफ लगाने से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता है।वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भी कहा कि प्रतिबंधों को पूरी तरह समाप्त नहीं किया गया है। उनके अनुसार, संबंधित कानून राष्ट्रपति को स्थिति की समीक्षा के लिए 60 दिन का समय देता है। उन्होंने यह भी दावा किया कि राहत का दायरा सीमित है और डीजल से संबंधित प्रतिबंध में छूट दी गई है।इसलिए पूरे प्रतिबंध ढांचे को समाप्त मानने के बजाय यह समझना जरूरी है कि किन प्रावधानों में राहत दी गई है और किन पर कार्रवाई जारी है।
मार्को रुबियो ने वैश्विक ऊर्जा बाजार पर कई अंतरराष्ट्रीय तनावों के प्रभाव का उल्लेख किया। उनके बयान के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव, होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति और सऊदी अरब पर हूती विद्रोहियों के हमलों जैसी घटनाएं तेल की आपूर्ति तथा कीमतों को प्रभावित कर सकती हैं।रुबियो ने कहा कि भारत जैसे देश पहले ही अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की दिशा में कदम उठा चुके हैं और रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदते हैं। ऐसे में उनके लिए बहुत कम समय में अपनी पूरी खरीद व्यवस्था बदलना आसान नहीं है।उन्होंने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण सहयोगी और साझेदार भी बताया। इस बयान से संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रशासन ऊर्जा सुरक्षा और भारत के साथ रणनीतिक संबंधों को भी अपने फैसलों के संदर्भ में देख रहा है। हालांकि, इससे भारत को भविष्य में किसी भी प्रकार के टैरिफ या प्रतिबंध से स्थायी छूट मिलने की पुष्टि नहीं होती।
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने दावा किया कि अमेरिका चाहता था कि यूरोपीय देश रूस से तेल खरीदने वाले बड़े देशों, विशेषकर भारत और चीन पर भी द्वितीयक प्रतिबंध लगाने में सहयोग करें। उनके मुताबिक, यूरोपीय सहयोगियों ने इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।बेसेंट ने सवाल उठाया कि जब यूरोप के कुछ देश खुद रूसी ऊर्जा खरीदना जारी रखते हैं, तो रूस पर आर्थिक दबाव बनाने की जिम्मेदारी केवल अमेरिका क्यों उठाए।उनके इस बयान से अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच रूस की ऊर्जा बिक्री पर कार्रवाई को लेकर नीतिगत मतभेदों का मुद्दा सामने आया है। हालांकि, यूरोपीय देशों की स्थिति और उनके अलग-अलग ऊर्जा संबंधी फैसलों को एक समान मानना उचित नहीं होगा।
रूस से तेल खरीदने वाले बड़े देशों पर अत्यधिक टैरिफ लगाने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो सकता है। भारत और चीन जैसे प्रमुख आयातकों पर शुल्क बढ़ने की स्थिति में ऊर्जा खरीद की लागत, व्यापारिक प्रवाह और विभिन्न बाजारों में कीमतों पर असर पड़ने की आशंका रहती है।दूसरी ओर, रूस पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के समर्थकों का तर्क है कि सख्त प्रतिबंधों से उसके ऊर्जा कारोबार और राजस्व पर प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में अमेरिकी प्रशासन के सामने रूस पर दबाव बनाने और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में बड़े व्यवधान से बचने के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है।
भारत के संदर्भ में सबसे अहम बात यह होगी कि अमेरिकी कानून और कार्यकारी आदेशों के तहत कौन से प्रतिबंध वास्तव में लागू रहते हैं, किन प्रावधानों में छूट दी जाती है और भारत से रूसी तेल खरीद को लेकर क्या शर्तें निर्धारित होती हैं।फिलहाल अमेरिकी मंत्रियों के बयान ऊर्जा बाजार की परिस्थितियों, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और आर्थिक प्रभावों को लेकर प्रशासन की दलीलों को सामने रखते हैं। भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ का खतरा टलने संबंधी दावे को अंतिम रूप से समझने के लिए संबंधित आदेश की शर्तों और आधिकारिक दस्तावेजों की पुष्टि जरूरी है।