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Unique celebration in Chhattisgarh! 'Chhatti' (post-birth ritual) held for a newborn elephant; villagers from 7 villages participated.
कोरबा के करतला वन परिक्षेत्र के साजापानी गांव में नवजात हाथी के जन्म की खुशी में छठी संस्कार का आयोजन किया गया। काशीरानी मंदिर के निकट वन क्षेत्र में जन्मे नन्हे हाथी की छठी छह दिन बाद गांव के मंदिर परिसर में पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाई गई। इस अवसर पर पूजन-अनुष्ठान, भजन-कीर्तन और भंडारे का आयोजन हुआ। धार्मिक और उत्साहपूर्ण माहौल में साजापानी सहित आसपास के सात गांवों के डेढ़ हजार से अधिक ग्रामीण शामिल हुए। कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधियों के साथ वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी भी उपस्थित रहे।
यह आयोजन काशीरानी नवयुवक सेवा समिति के तत्वावधान में किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत ग्राम देवी मां काशीरानी की पूजा-अर्चना के साथ हुई। इसके बाद नवजात हाथी की छठी के अवसर पर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए गए। ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना की और वन्यजीवों के प्रति प्रेम, सद्भावना तथा सह-अस्तित्व की भावना व्यक्त की। इस आयोजन में महिलाओं और बच्चों ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया। भंडारे के बाद भजन-कीर्तन का सिलसिला देर शाम तक चलता रहा। छठी कार्यक्रम में साजापानी के अलावा लबेद, घुईचुआ, जामपानी, पहाड़गांव, काशीपानी और करबीचुंआ गांवों के ग्रामीण शामिल हुए।
बड़ी संख्या में लोगों की उपस्थिति ने इसे सामूहिक उत्सव का रूप दे दिया। हाथियों की मौजूदगी से प्रभावित रहने वाले वनांचल क्षेत्र में इस तरह का आयोजन ग्रामीणों के बीच आपसी मेल-मिलाप और सामाजिक एकजुटता का माध्यम भी बना। काशीरानी नवयुवक सेवा समिति के अध्यक्ष बोधन चौहान ने बताया, कि छठी के आयोजन का उद्देश्य केवल धार्मिक परंपरा का निर्वहन करना ही नहीं, बल्कि हाथी प्रभावित क्षेत्र के ग्रामीणों को एक मंच पर लाकर आपसी मेल-जोल बढ़ाना भी है। उन्होंने कहा कि हाथी भी हमारे वनांचल और प्राकृतिक पर्यावरण का अभिन्न हिस्सा हैं। ऐसे में मनुष्य और वन्यजीवों के बीच सामंजस्य स्थापित करना जरूरी है। ग्रामीणों को हाथियों की मौजूदगी के साथ सुरक्षित तरीके से जीवन जीने और वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता बनाए रखने की आवश्यकता है। इस अवसर पर ग्रामीणों का कहना था, कि हाथियों के गांव के आसपास विचरण करने के बावजूद अब तक उनके गांव में किसी तरह का नुकसान नहीं हुआ है। इसी भावना के साथ ग्रामीणों ने नवजात हाथी के जन्म को खुशी के अवसर के रूप में मनाया। इस आयोजन के माध्यम से वन्यजीवों के प्रति सकारात्मक सोच और प्रकृति के साथ मिलकर रहने का संदेश भी दिया गया।
इस कार्यक्रम में विशेष रूप से शामिल कोरबा वन मंडल के एसडीओ मणिकांत वर्मा ने ग्रामीणों की भावना की सराहना की। उन्होंने कहा, कि वन्यजीवों के प्रति लोगों का ऐसा स्नेह और सद्भाव देखकर खुशी होती है। आमतौर पर हाथियों के विचरण के कारण प्रभावित क्षेत्रों में ग्रामीणों के मन में भय और नाराजगी की स्थिति बन जाती है, लेकिन साजापानी और आसपास के गांवों के लोगों ने जिस सकारात्मक सोच के साथ नवजात हाथी की छठी मनाई, वह प्रशंसनीय है। उन्होंने कहा, कि वन्यजीवों का संरक्षण केवल वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि इसमें स्थानीय लोगों की सहभागिता भी महत्वपूर्ण है। ग्रामीणों के सहयोग से मानव-हाथी सह-अस्तित्व को बेहतर बनाया जा सकता है। वन विभाग वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ-साथ ग्रामीणों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करने के लिए निरंतर प्रयास करता रहेगा। इसके लिए ग्रामीणों और वन अमले के बीच समन्वय बनाए रखना जरूरी है।
आपको बता दें, कि साजापानी के आसपास के वन क्षेत्र में हाथियों का दल अभी भी विचरण कर रहा है। दल में नवजात हाथी के शामिल होने के बाद उसके साथ हाथियों की आवाजाही बनी हुई है। वन विभाग की ओर से हाथियों के दल की गतिविधियों पर लगातार नजर रखी जा रही है, ताकि ग्रामीणों और वन्यजीवों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।वन विभाग ग्रामीणों से हाथियों के विचरण क्षेत्र से सुरक्षित दूरी बनाए रखने, उनके नजदीक जाने या उन्हें परेशान करने से बचने और हाथियों की मौजूदगी की सूचना मिलने पर सतर्क रहने की अपील कर रहा है। नवजात हाथी की छठी के अवसर पर आयोजित इस सामूहिक कार्यक्रम ने वन्यजीवों के प्रति ग्रामीणों की संवेदनशीलता और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की भावना को सामने रखा।