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What game is playing out behind everything visible on the screen? The government has now set its sights on the social media system that determines what the public sees.
नई दिल्ली। सोशल मीडिया पर किसी पोस्ट की पहुंच अचानक बढ़ जाना या किसी वीडियो का लाखों लोगों तक पहुंचने से पहले ही दब जाना अब सिर्फ तकनीकी प्रक्रिया नहीं माना जा रहा है। केंद्र सरकार का ध्यान उस पूरी व्यवस्था पर है, जिसके जरिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यह तय करते हैं कि यूजर की स्क्रीन पर कौन सा कंटेंट आएगा, कौन सा पीछे चला जाएगा और किस विषय को ज्यादा लोगों तक पहुंच मिलेगी।सरकार अब मेटा से यह जानना चाहती है कि फेसबुक, इंस्टाग्राम समेत उसके दूसरे प्लेटफॉर्म पर काम करने वाले एल्गोरिद्म किस आधार पर कंटेंट की प्राथमिकता तय करते हैं। साथ ही यह भी समझना चाहती है कि पेड प्रमोशन, विज्ञापन लक्ष्यीकरण और रिकमेंडेशन सिस्टम के जरिए लोगों की पसंद और सार्वजनिक चर्चा को किस हद तक प्रभावित किया जा सकता है।
मामला तब ज्यादा चर्चा में आया जब कुछ दिन पहले मेटा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़ा एक वीडियो कुछ समय के लिए अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया था। बाद में कंपनी ने इसे तकनीकी गलती बताया और वीडियो को दोबारा बहाल करते हुए खेद जताया।इसके बाद केंद्र सरकार ने मेटा के वरिष्ठ अधिकारियों को बुलाकर एल्गोरिद्म, कंटेंट मॉडरेशन और भारतीय कानूनों के पालन से जुड़े कई सवालों पर विस्तृत जानकारी मांगी। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव के समक्ष कंपनी के अधिकारियों ने अपनी व्यवस्था को लेकर प्रस्तुति भी दी।
सरकार का सवाल केवल यह नहीं है कि कोई पोस्ट क्यों हटाई गई। असली चिंता यह है कि अगर किसी तकनीकी सिस्टम के पास यह तय करने की ताकत है कि करोड़ों लोगों को कौन सी जानकारी ज्यादा दिखाई जाएगी, तो उस सिस्टम की जवाबदेही किसकी होगी।इसी वजह से सरकार राजनीतिक कंटेंट की रीच, विज्ञापन लक्ष्यीकरण, रिकमेंडेशन सिस्टम, कंटेंट हटाने की प्रक्रिया और भारतीय कानूनों के अनुपालन की पूरी व्यवस्था को समझना चाहती है।मेटा के प्रमुख प्लेटफॉर्म फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और मैसेंजर समेत कई सेवाओं का भारत में बड़ा यूजर आधार है। ऐसे में इन प्लेटफॉर्म के एल्गोरिद्म का प्रभाव केवल सोशल मीडिया तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सार्वजनिक चर्चा और लोगों की सूचना तक पहुंच पर भी असर डाल सकता है।
सबसे पहले सिस्टम यूजर की गतिविधियों को समझता है। वह देखता है कि व्यक्ति किस तरह की पोस्ट देखता है, किन वीडियो पर ज्यादा समय बिताता है, क्या लाइक करता है, क्या शेयर करता है और किस तरह की सामग्री के साथ ज्यादा जुड़ता है।इसके बाद उसी व्यवहार के आधार पर मिलते जुलते कंटेंट को प्राथमिकता मिलने लगती है। ज्यादा एंगेजमेंट हासिल करने वाली पोस्ट और वीडियो को भी अधिक लोगों तक पहुंच मिलने की संभावना बढ़ जाती है।यहीं से एक खास तरह का सूचना चक्र बन सकता है। यूजर को बार बार एक जैसे विचार, दावे या विषय दिखाई देने लगते हैं और धीरे धीरे उसे लगने लगता है कि यही सबसे प्रमुख या व्यापक जनमत है।
सोशल मीडिया पर बॉट और फर्जी अकाउंट का इस्तेमाल भी सरकार की चिंता का एक कारण है। संगठित नेटवर्क एक ही समय पर बड़ी संख्या में पोस्ट, कमेंट या हैशटैग चला सकते हैं।किसी वीडियो या मुद्दे को इस तरह कृत्रिम तरीके से ट्रेंड कराया जा सकता है कि आम यूजर को लगे कि उसके पीछे व्यापक जनसमर्थन मौजूद है। जबकि वास्तविकता में उस ट्रेंड को सीमित संख्या में संगठित अकाउंट संचालित कर रहे हो सकते हैं।
टेलीग्राम के संस्थापक पावेल ड्यूरोव ने टेकडाउन एक्सटॉर्शन नाम के एक नए साइबर खतरे को लेकर चेतावनी दी है। उनके अनुसार हमलावर किसी ऑनलाइन ग्रुप या प्लेटफॉर्म पर दबाव बनाकर उसे ऐप स्टोर से हटवाने की कोशिश कर सकते हैं।ड्यूरोव ने दावा किया कि हाल में एप्पल ने बिना पूर्व सूचना के कुछ समय के लिए टेलीग्राम को ऐप स्टोर से हटा दिया था। हालांकि बाद में इसे दोबारा बहाल कर दिया गया।
सरकार की ओर से मेटा से यह समझने की कोशिश की जा रही है कि किसी पोस्ट की रीच बढ़ाने या घटाने का फैसला किन मानकों पर होता है। राजनीतिक और विरोध प्रदर्शन से जुड़े कंटेंट की दृश्यता कैसे तय होती है और किसी पोस्ट को हटाने का निर्णय एआई आधारित सिस्टम करता है या मानव मॉडरेटर, इस पर भी जानकारी मांगी गई है।इसके साथ ही यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या कंपनी के एल्गोरिद्म भारतीय कानूनों, सामाजिक परिस्थितियों और स्थानीय संवेदनशीलताओं को पर्याप्त रूप से ध्यान में रखते हैं।
केंद्र सरकार ने संवेदनशील मामलों में केवल एआई आधारित मॉडरेशन पर निर्भर रहने को पर्याप्त नहीं माना है। राजनीतिक सामग्री, विरोध प्रदर्शन, सीएसएएम और डीपफेक जैसे मामलों में मानव हस्तक्षेप बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया गया है।सरकार का मानना है कि अत्यधिक संवेदनशील कंटेंट में केवल स्वचालित सिस्टम पर निर्भरता से गलत निर्णय की संभावना बनी रह सकती है। ऐसे मामलों में मानव स्तर पर जांच और समीक्षा की व्यवस्था जरूरी है।
एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि आखिर इन एल्गोरिद्म की स्वतंत्र जांच कौन करेगा। फिलहाल ऐसा कोई स्पष्ट कानूनी ढांचा नहीं है जिसके तहत सरकार या कोई स्वतंत्र एजेंसी सोशल मीडिया कंपनियों के एल्गोरिद्म का तकनीकी ऑडिट अपनी शर्तों पर कर सके।यही वजह है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की तकनीकी पारदर्शिता और जवाबदेही आने वाले समय में बड़ी नीतिगत बहस बन सकती है।
किसी संवेदनशील घटना के सामने आते ही सोशल मीडिया पर अलग अलग दावे, वीडियो और पोस्ट तेजी से फैलने लगते हैं। कई बार तथ्य सामने आने से पहले ही अलग अलग पक्ष अपनी कहानी को मजबूत करने में जुट जाते हैं।ऐसे माहौल में किसी पोस्ट की लोकप्रियता को उसकी सच्चाई का प्रमाण मानना जोखिम भरा हो सकता है। विशेषज्ञों की सलाह है कि सोशल मीडिया पर सामने आई महत्वपूर्ण जानकारी को अंतिम सत्य मानने से पहले संबंधित सरकारी विभाग, आधिकारिक दस्तावेज या विश्वसनीय स्रोत से उसकी पुष्टि की जाए।