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Who, after all, has the right to the road?
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में देश की सड़कों पर फैली अराजकता पर कड़ी टिप्पणी की है। एक मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पी एस नरसिम्हा एवं जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि सरकार की जिम्मेदारी है कि पैदल चलने वालों के लिए सड़क पर अलग और अतिक्रमण मुक्त जगह सुनिश्चित करे। पहले भी सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि सड़क पर पैदल चलना प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है इसलिए यह सरकार का संवैधानिक दायित्व है कि इस अधिकार की सुरक्षा करे। सवाल यह है कि अगर सड़क पर पैदल यात्रियों का चलना भी मुश्किल है तो आखिर सड़क है किसकी? सड़क पर ऐसी असुरक्षा शायद ही किसी देश में हो जैसी भारत में है। इस हद तक कि सड़क दुघटनाओं में मरने वाले कुल लोगों में लगभग 20 प्रतिशत पैदल राहगीर होते हैं। यानी वाहन चलाना तो खतरों से भरा है ही, सड़क पर पैदल चलना भी सुरक्षा की गारंटी नहीं।
अब तो महानगरों के साथ साथ छोटे और मझोले शहरों में भी वाहनों की तादाद बढ़ती जा रही है और उसी अनुपात में दुर्घटनाएं भी बढ़ती जा रही हैं। देश भर में प्रतिदिन सड़क दुघटनाओं में लगभग 500 लोगों की मृत्यु हो जाती है यानी हर 3 मिनट में एक मौत। जितनी देर में आप यह लेख पढ़ चुके होंगे उतनी देर में देश में कहीं न कहीं 2-3 लोग सड़क दुर्घटना में अपनी जान गंवा देंगे। दुर्एघटनाओं का मुख्य कारण ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन है जिसमें तेज रफ्तार, नशे में ड्राइविंग और, गलत ओवरटेकिंग, सीट बेल्ट न लगाना और हेलमेट न पहनना आदि हैं। साथ ही सड़कों पर बेरोकटोक घूमते आवारा जानवर भी दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। एक भाग्यवादी देश में इसे किस्मत और भगवान का बुलावा समझ लिया जाता है लेकिन वास्तव में यह कानून व्यवस्था की कमजोरी और सिस्टम की लापरवाही का नतीजा है।
यातायात की अराजकता को आम तौर पर ज्यादा आबादी और कम संसाधनों से जोड़ कर स्वीकार कर लिया जाता है लेकिन इस समस्या के बहुत से पहलू ऐसे भी हैं जो सिर्फ कानून व्यवस्था की कमजोरी के कारण पैदा होते हैं। सबसे पहला कारण है ड्राइविंग लाइसेंस का बहुत आसानी से बन जाना। आरटीओ दफ्तरों में दलाल इतने ताकतवर हैं कि बिना परीक्षा के भी किसी का ड्राइविंग लाइसेंस बनवा सकते हैं। भारत में अक्सर पहले लाइसेंस बनता है बाद में व्यक्ति गाड़ी चलाना सीखता है। और लाखों वाहन तो बिना लाइसेंस के ड्राइवर भी चला रहे हैं। हर स्कूल के सामने सैकड़ों मोटरसाइकिल खड़ी दिखती हैं जो नाबालिग स्कूली छात्र बेधड़क चला रहे हैं। छोटी दूरियों में ट्रक और टैक्सी भी बिना लायसेंस और बिना वैध कागज़ात के धड़ल्ले से चलाई जा रहे हैं। इनमें से अधिकांश गाड़ियां तो आपराधिक रिकॉर्ड वाले बाहुबली अथवा राजनेता ही चलवाते हैं। पुलिस का महकमा बड़ी मुस्तैदी से ट्रैफिक पर नजर रखता है लेकिन रिश्वतखोरी के चलते वो सड़क पर होने वाली सारी गलतियां माफ कर देते हैं।
दो बड़ी समस्यायें पार्किंग और अतिक्रमण की हैं। शहरों में गाड़ियों की तादाद बढ़ती जा रही है लेकिन पार्किंग की कोई व्यवस्था नहीं। कहीं कहीं स्थानीय निकायों ने पार्किंग कॉम्प्लेक्स बनाये भी हैं लेकिन उनकी क्षमता गाड़ियों की संख्या के अनुपात में काफी कम है। ज्यादातर गाड़ियां बेतरतीब तरीके से सड़कों पर ही खड़ी कर दी जाती हैं जिससे सड़क पर चलने के लिए पर्याप्त जगह ही नहीं बचती। देश में वीआईपी कल्चर का सबसे बेहूदा प्रदर्शन सड़कों पर ही देखने मिलता है जहां वीआईपी की गाड़ियां एकदम बेढंगे तरीके से खड़ी दिखाई देती हैं। और तो और मंत्रियों का काफिला निकलता है तो सारा ट्रैफिक ही रोक दिया जाता है। इसके अलावा अतिक्रमण पर कोई पुख्ता कार्रवाई न होने से फुटपाथ तो लगभग खत्म हो चुके हैं और अतिक्रमण अब सड़कों पर आ गए हैं। चाहे व्यावसायिक क्षेत्र हो या रहवासी कॉलोनी। जो जितना पॉवरफुल नागरिक है वह उतना ज्यादा अतिक्रमण करके सड़क की चौड़ाई कम कर रहा है। अगर स्थानीय निकाय हटाते भी हैं तो कड़ी निगरानी और मोटे जुर्माने के अभाव में कुछ दिन बाद फिर अतिक्रमण वापस हो जाता है।
सड़क पर चलने वालों का अधिकार छीनने में सबसे आगे हैं राजनीतिक पार्टियां, धार्मिक जनता और अनेक सामाजिक संगठन। इन सबके द्वारा सड़क को मैदान समझ लिया गया है कि जब चाहो तब मजमा लगा दो या जुलूस निकाल दो। यह हमारे देश में ही सम्भव है कि दशहरा, गणेशोत्सव, जन्माष्टमी, रामनवमी, शिवरात्रि, होली, दिवाली, मोहर्रम, गुड फ्राइडे वगैरह और राज्यों के अपने अपने तीज त्यौहार सड़कों पर ही मनाने पर कोई रोक नहीं। मजमा, सजावट, नाच-गाना आतिशबाजी, हुल्लड़ सब कुछ सड़क पर किया जा सकता है। कई त्यौहारों में तो आठ-दस दिनों तक सड़क पर कब्ज़ा कर लिया जाता है। फिर राजनीतिक और धार्मिक स्वार्थ के लिये धरना, प्रदर्शन, रोड जाम, रैली, भाषण आदि इतने आम हो गए हैं कि जब तब नागरिकों को मुसीबत का सामना करना पड़ता है। कई बार तो बारातों के कारण जाम लग जाता है क्योंकि सफल बारात वही मानी जाती है जिसमें भरपूर डांस हो और ज्यादा से ज्यादा जाम लगे। कारण राजनीतिक हो, सामाजिक हो, धार्मिक हो, सबको सड़क के दुरूपयोग की छूट मिली है। इन सबके कारण बहुतों की ट्रेन या फ्लाइट छूट जाती है, कई छात्र परीक्षा में समय पर नहीं पहुंच पाते और यदा कदा जाम के कारण एंबुलेंस में ही मौत की खबरें भी सुनने मिलती रहती हैं।
रोड पर तमाशा करने वालों का हंगामा सिर्फ शोर शराबे और ट्रैफिक जाम तक सीमित नहीं है। मौका मिलने पर ये भीड़ हिंसा से परहेज नहीं करती। अभी हाल में सावन का महीना लगते ही हरिद्वार तक पहुंचने वाली सालाना कांवड़ यात्रा शुरू हुई है। शुरुआत में ही लखनऊ में बच्चों से भरी वैन पर और गाजियाबाद में एम्बुलेंस पर तोड़ फोड़ हुई। मेरठ में तो कांवड़ियों के दो गुट आपस में ही भिड़ गये। सिर्फ कांवड़ यात्री ही नहीं, बहुत से दूसरे जुलूसों और रैलियों में भी नेताओं के समर्थक हिंसा करने से बाज नहीं आते। ट्रकों और बसों में भर कर सम्मेलनों, रैलियों में जाने वाले किराये के समर्थकों द्वारा भी तोड़ फोड़ और मार पीट की घटनाएं भी होती रहती हैं। वैसे तो कहा भी जाता है कि भीड़ का दिमाग नहीं होता लेकिन भारत में भीड़तंत्र का हंगामा दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है। ऐसी अराजक भीड़ को राजनेताओं की शह भी है क्योंकि वे ही इसका बेजा इस्तेमाल करके सरकार पर दबाव डालने की कोशिश करते हैं। ऊपर से कानून व्यवस्था की निरन्तर बिगड़ती हालत ने भीड़ का हौसला और भी बढ़ा दिया है।
सुप्रीम कोर्ट भले ही आम नागरिक के सड़क पर चलने के अधिकार को लेकर चिन्तित है लेकिन पुलिस और प्रशासन इससे बिल्कुल बेखबर हैं। असलियत यह है कि पुलिस पर प्रशासन का दबाव है और प्रशासन पर राजनेताओं का। इसकी वजह से सड़कों पर फैली अराजकता को रोकना बहुत चुनौतीपूर्ण काम है। सड़क पर रोजमर्रा के तमाशों को खत्म करने के लिये पूरे सिस्टम में मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत है ताकि राजनेता अपने अपने वोट बैंक को बढ़ावा देने के बजाय जनता की परेशानी की तरफ ध्यान दे सकें। सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी के मद्देनजर पुलिस और प्रशासन का कर्त्तव्य है कि सड़कों की अराजकता खत्म करने के लिये ईमानदार और कठोर प्रयास शुरू कर दिये जाएँ।
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