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Women's reservation stalled again, Constitution Amendment Bill falls in Parliament
नई दिल्ली। संसद का शुक्रवार का दिन राजनीतिक टकराव और भारी हंगामे के नाम रहा। लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल सका। कुल 528 वोटिंग में 298 वोट पक्ष में और 230 विरोध में पड़े, लेकिन बिल पास होने के लिए जरूरी दो तिहाई यानी 352 वोट नहीं मिल पाए।
गणित ने रोका रास्ता, 2029 में भी नहीं मिलेगा लाभ
इस परिणाम के साथ साफ हो गया है कि महिला आरक्षण का लाभ अब 2029 तक भी लागू नहीं हो पाएगा। मौजूदा प्रावधानों के अनुसार यह आरक्षण जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होगा, जिससे इसकी समयसीमा और आगे खिसककर 2034 के बाद तक जा सकती है।
24 साल बाद संसद में गिरा कोई सरकारी बिल
यह घटना संसदीय इतिहास में अहम मानी जा रही है। 2002 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है जब कोई सरकारी विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो सका। वहीं 1990 के बाद यह पहला संविधान संशोधन विधेयक है जो सदन में गिर गया।
30 साल में सातवीं बार महिलाओं को झटका
1996 से लेकर 2026 तक महिला आरक्षण से जुड़ा प्रयास सातवीं बार अधूरा रह गया। हर बार किसी न किसी कारण से यह बिल अंतिम मंजिल तक नहीं पहुंच सका।
प्रधानमंत्री की अपील भी नहीं आई काम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मतदान से पहले सभी सांसदों से अपील की थी कि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनें और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए बिल के पक्ष में वोट करें। उन्होंने इसे ऐतिहासिक अवसर बताया, लेकिन सदन में सहमति नहीं बन सकी।
विपक्ष का हमला, ‘यह महिला सशक्तिकरण नहीं’
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बिल को महिलाओं के अधिकारों से नहीं, बल्कि चुनावी गणित से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि यह विधेयक असल में चुनावी ढांचे को बदलने की कोशिश है और पुराना बिल लाकर ही समर्थन दिया जाएगा।
सत्ता पक्ष का पलटवार, विपक्ष पर महिला विरोधी होने का आरोप
रक्षा मंत्रीराजनाथ सिंह समेत सत्ता पक्ष के नेताओं ने विपक्ष पर महिला विरोधी राजनीति करने का आरोप लगाया। उनका कहना है कि विपक्ष ने महिलाओं के अधिकारों को नजरअंदाज किया।
दक्षिण की राजनीति भी आई केंद्र में
तमिलनाडु के मुख्यमंत्रीएम. के. स्टालिन ने बिल गिरने को दक्षिण भारत की जीत बताते हुए इसे ‘दिल्ली बनाम राज्यों’ की लड़ाई करार दिया।
आगे क्या, सियासत और तेज होने के संकेत
इस पूरे घटनाक्रम के बाद महिला आरक्षण का मुद्दा फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार इस विषय पर नया रास्ता निकालती है या यह मुद्दा आने वाले चुनावों में बड़ा चुनावी एजेंडा बनता है।