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bilaspur high court rejects bail 105kg ganja mastermind
बिलासपुर। नशीले पदार्थों की तस्करी के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने 105 किलोग्राम गांजा तस्करी मामले के कथित मास्टरमाइंड की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। एनडीपीएस एक्ट के तहत दर्ज इस गंभीर मामले में हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की सिंगल बेंच ने आरोपी को राहत देने से इनकार कर दिया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सह-आरोपियों के मेमोरेंडम कथन और कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) से प्रथम दृष्टया यह स्पष्ट होता है कि आरोपी की इस अवैध कारोबार में मुख्य भूमिका और संलिप्तता रही है। ऐसे में इसे झूठा फंसाने का मामला नहीं माना जा सकता।
क्या है मामला?
मामला बेमेतरा जिले के बेरला थाना क्षेत्र का है। अभियोजन के अनुसार, पुलिस ने मुखबिर की सूचना पर एक पिकअप वाहन को रोककर उसकी तलाशी ली, जिसमें से 105 किलोग्राम गांजा बरामद किया गया। मौके से सह-आरोपी मोहम्मद खान उर्फ अयाज को गिरफ्तार किया गया था।
पूछताछ के दौरान मोहम्मद खान ने खुलासा किया कि गांजे की पूरी खेप भिलाई निवासी हरदीप सिंह मेहरा उर्फ हरप्रीत उर्फ गोगे (38) के निर्देश पर ले जाई जा रही थी। उसने बताया कि हरदीप ने ही एक मोबाइल नंबर पर संपर्क करने और गांजे की सप्लाई के लिए सह-आरोपी अबराम नायक को एक लाख रुपये नकद देने के निर्देश दिए थे।
जांच के दौरान पुलिस ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड खंगाले, जिसमें आरोपियों के बीच लगातार संपर्क और बातचीत की पुष्टि हुई। इसके बाद पुलिस ने 1 अप्रैल 2025 को हरदीप सिंह मेहरा को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 20(बी) के तहत मामला दर्ज कर चार्जशीट पेश की।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि आरोपी पिछले 14 महीनों से जेल में बंद है। मामले में कुल 39 गवाह हैं, जिनमें अब तक केवल एक गवाह का बयान दर्ज हो सका है, इसलिए ट्रायल पूरा होने में लंबा समय लग सकता है। साथ ही तलाशी और जब्ती की कार्रवाई में एनडीपीएस एक्ट के अनिवार्य प्रावधानों के पालन पर भी सवाल उठाए गए।
वहीं राज्य शासन की ओर से पैनल वकील समीक्षा गुप्ता ने जमानत का विरोध करते हुए कहा कि बरामद गांजा व्यावसायिक मात्रा से कहीं अधिक है और आरोपी पूरे रैकेट का मास्टरमाइंड है, जिसने नेटवर्क और पैसों का इंतजाम किया था। इसलिए उसे जमानत नहीं दी जानी चाहिए।
मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी। हालांकि, धीमी न्यायिक प्रक्रिया को देखते हुए अदालत ने निचली अदालत को आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से छह महीने के भीतर ट्रायल तेजी से पूरा करने के निर्देश दिए हैं।