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bilaspur high court stay on chhattisgarh police head constable promotion
Bilaspur High Court ने छत्तीसगढ़ पुलिस विभाग में आरक्षकों से प्रधान आरक्षक पद पर होने वाली पदोन्नति प्रक्रिया को लेकर बड़ा अंतरिम आदेश जारी किया है। हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने फिलहाल प्रमोशन प्रक्रिया के तहत अंतिम आदेश जारी करने पर रोक लगा दी है।
जस्टिस P. P. Sahu की अदालत ने स्पष्ट किया कि विभागीय पदोन्नति समिति अपनी मूल्यांकन प्रक्रिया जारी रख सकती है, लेकिन अगली सुनवाई और कोर्ट की अनुमति के बिना किसी भी आरक्षक को प्रमोशन का अंतिम आदेश जारी नहीं किया जाएगा।
यह आदेश कोरबा जिले सहित विभिन्न थानों में पदस्थ 73 आरक्षकों द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया। याचिकाकर्ताओं में लव कुमार पात्रे, भूपेंद्र कुमार पटेल और विक्रम सिंह शांडिल्य समेत कई पुलिसकर्मी शामिल हैं।
याचिकाकर्ताओं ने राज्य शासन, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक, आईजी बिलासपुर रेंज और एसपी कोरबा समेत अन्य अधिकारियों को पक्षकार बनाया है। आरक्षकों का आरोप है कि वर्तमान पदोन्नति प्रक्रिया में तय नियमों और सेवा शर्तों की अनदेखी की जा रही है।
याचिका में कहा गया कि यदि अदालत हस्तक्षेप नहीं करती तो 1 जून 2026 को जारी होने वाली फाइनल फिट लिस्ट नियमों के विपरीत तैयार हो जाती, जिससे लंबे समय से एक ही जिले में सेवा दे रहे जवानों के अधिकार प्रभावित होते।
क्या है विवाद?
आरक्षकों ने अदालत में ‘छत्तीसगढ़ पुलिस एग्जीक्यूटिव फोर्स कांस्टेबल भर्ती, पदोन्नति एवं सेवा शर्त नियम 2007’ में किए गए संशोधनों का हवाला दिया। नियमों के अनुसार यदि कोई पुलिस कर्मचारी अपनी इच्छा से एक जिले से दूसरे जिले में तबादला कराता है, तो नए जिले की वरिष्ठता सूची में उसका नाम सबसे नीचे दर्ज किया जाना चाहिए।
याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस मुख्यालय द्वारा चल रही प्रक्रिया में ऐसे कर्मचारियों को भी उनकी मूल नियुक्ति तिथि के आधार पर वरिष्ठ मानते हुए प्रमोशन देने की तैयारी की जा रही है, जिन्होंने स्वेच्छा से जिला बदला था।
राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि पुलिस मुख्यालय के स्पष्टीकरण पत्र को याचिका में सीधे चुनौती नहीं दी गई है। सरकार ने यह भी कहा कि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, याचिका दायर करने वाले कई आरक्षकों के नाम भी फिट लिस्ट में शामिल हो सकते हैं।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने माना कि मामला प्रथम दृष्टया सेवा नियमों के उल्लंघन से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। इसके बाद अदालत ने अंतिम प्रमोशन आदेश जारी करने पर अंतरिम रोक लगा दी।