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chhattisgarh 85000 serving teachers separate tet demand supreme court deadline
रायपुर। शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) को लेकर छत्तीसगढ़ के हजारों सेवारत शिक्षकों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद प्रदेश के करीब 85 हजार सेवारत शिक्षकों के लिए TET उत्तीर्ण करना जरूरी बताया जा रहा है। वहीं, दूसरे राज्यों में लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को राहत देने के लिए अलग TET अथवा विशेष परीक्षा आयोजित करने की तैयारी की खबरों के बीच छत्तीसगढ़ के शिक्षक भी सरकार के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने सेवारत शिक्षकों को TET योग्यता हासिल करने के लिए 31 अगस्त 2028 तक का समय दिया है। कोर्ट के इस फैसले के बाद राज्यों को शिक्षकों को परीक्षा में शामिल होने के पर्याप्त अवसर देने की दिशा में काम करना है। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और सक्षम प्राधिकारियों को TET नियमित रूप से आयोजित करने, बेहतर स्थिति में साल में दो बार परीक्षा कराने की बात भी कही है।
दूसरे राज्यों में अलग TET की तैयारी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु जैसे राज्यों में सेवारत शिक्षकों के लिए विशेष अथवा अलग TET आयोजित करने की दिशा में काम चल रहा है। इसका उद्देश्य लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को अपनी नौकरी के साथ परीक्षा की तैयारी और पात्रता हासिल करने का व्यावहारिक अवसर देना बताया जा रहा है।
इसी वजह से छत्तीसगढ़ में भी शिक्षक संगठन सरकार से स्पष्ट नीति बनाने की मांग कर रहे हैं। शिक्षकों का तर्क है कि बड़ी संख्या में ऐसे शिक्षक हैं जो लंबे समय से सरकारी स्कूलों में सेवाएं दे रहे हैं। ऐसे में उनके लिए परीक्षा का स्वरूप, तैयारी के लिए समय और सेवा संबंधी मामलों को स्पष्ट किया जाना जरूरी है।
85 हजार शिक्षकों के सामने क्या है चुनौती?
प्रदेश में करीब 85 हजार ऐसे शिक्षकों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें TET उत्तीर्ण करना जरूरी है। इन शिक्षकों में लंबे समय से सेवा दे रहे कर्मचारी भी शामिल हैं। शिक्षकों का कहना है कि उन्हें अचानक परीक्षा की तैयारी के लिए स्पष्ट व्यवस्था नहीं मिलने से मानसिक दबाव और भविष्य को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित समयसीमा फिलहाल 31 अगस्त 2028 है। यह समयसीमा पहले 31 अगस्त 2027 थी, जिसे एक वर्ष बढ़ाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक अवसर के रूप में दिया है और आगे और समय बढ़ाने की मांग स्वीकार नहीं करने की बात कही है।
शिक्षक संघर्ष मोर्चा ने रखीं पांच प्रमुख मांगें
छत्तीसगढ़ में शिक्षक संघर्ष मोर्चा ने इस मामले को लेकर सरकार के सामने पांच सूत्रीय मांगें रखी हैं। संगठन की प्रमुख मांग है कि सेवारत शिक्षकों के लिए शिक्षा विभाग की ओर से अलग विभागीय TET आयोजित की जाए। इसके लिए DPI या SCERT के माध्यम से परीक्षा कराने और परीक्षा को जिला स्तर पर आयोजित करने की मांग की गई है, ताकि दूरदराज क्षेत्रों में पदस्थ शिक्षकों को भी परीक्षा में शामिल होने में आसानी हो।
शिक्षक संगठन ने सेवारत शिक्षकों के लिए परीक्षा में न्यूनतम उत्तीर्णांक 33 प्रतिशत निर्धारित करने की मांग भी रखी है। इसके अलावा सेवारत शिक्षकों को TET की अनिवार्यता से छूट देने के लिए केंद्र स्तर पर अध्यादेश अथवा नियमों में संशोधन की पहल करने की मांग की गई है।
पदोन्नति को लेकर भी चिंता
शिक्षकों की एक बड़ी चिंता पदोन्नति को लेकर है। संगठन की मांग है कि 31 अगस्त 2028 तक TET उत्तीर्ण करने की समयसीमा को ध्यान में रखते हुए इस अवधि के दौरान पदोन्नति प्रक्रिया जारी रखी जाए। साथ ही पदोन्नति आदेशों को सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय के अधीन रखने की मांग की गई है।
शिक्षकों का कहना है कि यदि TET को पदोन्नति से सीधे जोड़ दिया गया और परीक्षा से पहले पदोन्नति प्रक्रिया प्रभावित हुई तो लंबे समय से सेवा दे रहे कर्मचारियों को नुकसान हो सकता है। इसलिए सरकार को संक्रमण अवधि के लिए स्पष्ट व्यवस्था बनानी चाहिए।
सरकार के फैसले का इंतजार
शिक्षक संघर्ष मोर्चा की ओर से मुख्यमंत्री, स्कूल शिक्षा मंत्री, शिक्षा सचिव और DPI संचालक को मांग पत्र सौंपे जाने का उल्लेख भी सामने आया है। संगठन चाहता है कि दूसरे राज्यों की तर्ज पर छत्तीसगढ़ में भी सेवारत शिक्षकों के लिए अलग TET की व्यवस्था पर जल्द निर्णय लिया जाए।
फिलहाल प्रदेश के हजारों शिक्षक सरकार के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की समयसीमा के कारण TET का मुद्दा अब केवल परीक्षा तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसका सीधा संबंध सेवा, पदोन्नति और शिक्षकों के भविष्य से जुड़ गया है। ऐसे में सरकार यदि अलग विभागीय TET अथवा विशेष परीक्षा की व्यवस्था करती है तो लंबे समय से सेवा दे रहे शिक्षकों को तैयारी का स्पष्ट रास्ता मिल सकता है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार TET की अनिवार्यता का उद्देश्य प्राथमिक शिक्षा में शिक्षकों की न्यूनतम पात्रता सुनिश्चित करना है। अदालत ने सेवारत शिक्षकों को पात्रता हासिल करने के लिए समय दिया है, जबकि राज्यों को पर्याप्त परीक्षा अवसर उपलब्ध कराने की दिशा में कदम उठाने को कहा गया है।