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रायपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने भिलाई के होटल कारोबारी आकाश कुमार साहू (30) के साथ पुलिस की कथित बर्बरता और अवैध गिरफ्तारी के मामले में सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता को 1 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाए और इसके बाद दोषी पुलिसकर्मियों से राशि वसूल की जा सकती है।
हाईकोर्ट ने कहा कि इस घटना ने जनता के पुलिस और न्याय व्यवस्था में विश्वास को कमजोर किया है। साथ ही गृह विभाग के सचिव को निर्देश दिया गया है कि पुलिस बल को मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाया जाए ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।
भिलाई के अवंतीबाई चौक निवासी आकाश कुमार साहू लॉ के छात्र हैं और परिवार का भरण-पोषण करने के लिए कोहका में होटल संचालित करते हैं। उन्होंने अपने एडवोकेट के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया कि उनका होटल सभी वैधानिक अनुमति और लाइसेंस के साथ संचालित हो रहा है और यह उनका एकमात्र आय का जरिया है।
आकाश ने दावा किया कि 8 सितंबर 2025 को पुलिस अधिकारी और जवान उनके होटल में आए। उन्होंने होटल में ठहरे लोगों से पूछताछ करने का बहाना बनाया और रजिस्टर तथा पहचान दस्तावेजों की जांच की।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि पुलिस ने बगैर महिला पुलिस बल के एक कमरे में घुसकर पुरुष और महिला ठहरे लोगों को कमरे से बाहर निकाला। इस दौरान होटल मैनेजर के साथ बेहमी से दुर्व्यवहार किया गया और धमकियां दी गईं। बाद में पुलिस अफसर और जवान फिर से होटल पहुंचे और कर्मचारियों पर सोने के आभूषण चोरी का झूठा आरोप लगाया।
होटल कर्मचारियों ने पुलिस को सीसीटीवी कैमरों की जानकारी दी और जांच करने को कहा, लेकिन पुलिस अफसरों ने कमरों की तलाशी और होटल मैनेजर की पिटाई की। बाद में आकाश को बुलाकर गाली-गलौज और अपमानजनक व्यवहार के साथ हिरासत में लिया गया और फिर बिना किसी वैध कारण के जेल भेज दिया गया।
पुलिस का कहना था कि वे गुमशुदा लड़की की तलाश में होटल पहुंचे थे। पुलिस ने आरोप लगाया कि आकाश ने सरकारी काम में बाधा डाली, पुलिस वाहन की चाबी छीन ली और ड्राइवर के साथ हाथापाई की। इसी आधार पर उन्हें बीएनएस की धारा 170 के तहत हिरासत में लिया गया।
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई संज्ञेय अपराध दर्ज नहीं था। केवल संदेह और कहासुनी के आधार पर गिरफ्तारी और जेल भेजना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित में कारण बताना अनिवार्य है, लेकिन आकाश ने गिरफ्तारी मेमो पर लिखा कि उन्हें किसी मामले की जानकारी नहीं थी।
साथ ही हाईकोर्ट ने एसडीएम (सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट) की भूमिका पर नाराजगी जताई। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट को न्यायिक प्रहरी होना चाहिए, लेकिन उन्होंने बिना जांच-पड़ताल के पुलिस की रिपोर्ट पर मुहर लगा दी और आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेज दिया।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ शुरू की गई सभी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। राज्य सरकार को आदेश दिया गया है कि 4 सप्ताह में 1 लाख रुपए का मुआवजा भुगतान करें। सरकार को अधिकार दिया गया है कि दोषी पुलिस अधिकारियों से राशि वसूल की जा सकती है। भुगतान में देरी होने पर 9% वार्षिक ब्याज लगेगा।
कोर्ट ने कहा, “पुलिस अधिकारियों के अवैध कार्य और अत्याचार से जनता के न्याय व्यवस्था पर विश्वास की नींव कमजोर होती है। संवैधानिक शासन में नागरिकों का भरोसा बनाए रखना जरूरी है।”
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह पुलिस कर्मियों को मानवाधिकारों और संवैधानिक अधिकारों के प्रति संवेदनशील बनाने के लिए गंभीर कदम उठाए ताकि भविष्य में इस तरह की बर्बर घटनाएं रोक जा सकें।