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रायपुर। छत्तीसगढ़ की राजनीति में इन दिनों खेत और खेती की तस्वीरें भी सियासी चर्चा का विषय बन गई हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और सरकार के मंत्रियों तक, नेताओं की खेतों में काम करते हुए तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे हैं। इन तस्वीरों में जहां मुख्यमंत्री साय पारंपरिक खेती के तौर-तरीकों के साथ नजर आ रहे हैं, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल आधुनिक कृषि तकनीक के जरिए ड्रैगन फ्रूट की खेती का जायजा लेते दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में खेत अब सिर्फ खेती का मैदान नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश देने का एक नया मंच भी नजर आने लगा है।
बैलों की जोड़ी के साथ हल चलाते दिखे मुख्यमंत्री साय
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय हाल ही में अपने गृहग्राम बगिया पहुंचे, जहां उन्होंने खेत में बैलों की जोड़ी के साथ पारंपरिक तरीके से हल चलाया और बियासी की। इस दौरान उनकी तस्वीरें और वीडियो इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित हुए। रिपोर्टों के मुताबिक, मुख्यमंत्री ने खेती-किसानी को अपने जीवन और संस्कार से जोड़ते हुए अपनी माटी और गांव से जुड़े रहने को सुकून देने वाला बताया।
मुख्यमंत्री का यह अंदाज इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि वे आधुनिक राजनीतिक जीवन के बीच एक खांटी ग्रामीण किसान की छवि में नजर आए। हाथ में हल, साथ में बैल और खेत की मिट्टी में उतरकर काम करते साय की तस्वीरें सीधे तौर पर प्रदेश के उस बड़े किसान वर्ग से संवाद करती दिखाई देती हैं, जिसकी भूमिका छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण है।
मुख्यमंत्री ने खेती-किसानी से अपने पुराने जुड़ाव और परंपराओं को बनाए रखने की जरूरत पर भी जोर दिया है। उनका संदेश यही है कि आधुनिकता के दौर में भी अपनी जड़ों और ग्रामीण परंपराओं से रिश्ता कायम रहना चाहिए।
पहले मंत्री भी खेतों में उतर चुके हैं
मुख्यमंत्री से पहले सरकार के मंत्री भी खेतों में काम करते नजर आ चुके हैं। मंत्री टंकराम वर्मा और मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े के खेत में काम करते हुए वीडियो और फोटो इंटरनेट मीडिया पर चर्चा में रहे हैं। यानी सत्ता पक्ष के नेताओं की ग्रामीण और किसान वाली तस्वीरें लगातार सार्वजनिक मंच पर दिखाई दे रही हैं।
खास तौर पर महिला एवं बाल विकास मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े की खेत में कुर्सी पर बैठकर धान का रोपा लगाते हुए तस्वीर पिछले साल खूब वायरल हुई थी। इस तस्वीर को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आई थीं और मामला राजनीतिक चर्चा का विषय भी बना था।
इसके बाद खेत में नेताओं की मौजूदगी और वहां काम करते हुए फोटो-वीडियो को लेकर यह सवाल भी उठता रहा है कि ये तस्वीरें महज खेती से जुड़ाव दिखाने का माध्यम हैं या इनके पीछे ग्रामीण मतदाताओं तक राजनीतिक संदेश पहुंचाने की रणनीति भी है।
दूसरी तस्वीर में आधुनिक खेती का चेहरा
इसी बीच पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की खेत से जुड़ी तस्वीर भी चर्चा में है। वे अपने बेटे चैतन्य बघेल के साथ ड्रैगन फ्रूट की खेती का मुआयना करते दिखाई दे रहे हैं। यहां तस्वीर का अंदाज मुख्यमंत्री साय की तस्वीर से अलग है। एक तरफ साय पारंपरिक साधनों और बैलों के साथ खेत में हल चलाते नजर आए, तो दूसरी तरफ बघेल आधुनिक साधनों और नई तकनीक आधारित खेती का जायजा लेते दिखाई दे रहे हैं।

ड्रैगन फ्रूट जैसी वैकल्पिक और आधुनिक खेती किसानों को पारंपरिक धान की खेती से आगे बढ़कर कृषि में नए विकल्प तलाशने का संदेश देती है। देश के कई हिस्सों में किसान ड्रैगन फ्रूट की खेती को आय के वैकल्पिक स्रोत के तौर पर अपना रहे हैं।
एक ही खेत, लेकिन दो अलग-अलग राजनीतिक तस्वीरें
छत्तीसगढ़ की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर में खेत से जुड़ी इन दोनों तरह की तस्वीरों को साथ रखकर देखा जाए तो एक दिलचस्प राजनीतिक संदेश उभरता है। मुख्यमंत्री साय की तस्वीर पारंपरिक खेती, गांव, मिट्टी और किसान के साथ भावनात्मक जुड़ाव को सामने रखती है। वहीं भूपेश बघेल की ड्रैगन फ्रूट वाली तस्वीर आधुनिक कृषि, तकनीक और खेती में बदलाव की संभावनाओं का संकेत देती है।
यानी एक तरफ 'माटी से जुड़ाव' है तो दूसरी तरफ 'आधुनिक खेती की ओर कदम'। दोनों तस्वीरें अलग-अलग राजनीतिक और सामाजिक संदेश देती हैं।
खेत बने सियासी जुड़ाव का माध्यम
छत्तीसगढ़ जैसे कृषि प्रधान राज्य में किसान और खेती राजनीति के बेहद महत्वपूर्ण विषय हैं। ऐसे में नेताओं का खेतों में उतरना केवल व्यक्तिगत शौक या पारिवारिक जुड़ाव तक सीमित नहीं रहता। उनकी तस्वीरें और वीडियो जब इंटरनेट मीडिया पर पहुंचते हैं तो वे राजनीतिक संचार का हिस्सा भी बन जाते हैं।
मुख्यमंत्री साय का बैलों के साथ खेत जोतना जहां ग्रामीण और पारंपरिक छवि को मजबूत करता है, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री बघेल का आधुनिक खेती का जायजा लेना कृषि में नए प्रयोगों और तकनीक की ओर संकेत करता है। यही वजह है कि खेतों से आई ये तस्वीरें अब सियासी नजरिए से भी देखी जा रही हैं।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि 'माटी और किसान' से जुड़ाव की यह तस्वीरें सिर्फ इंटरनेट मीडिया तक सीमित रहती हैं या खेती-किसानी की नीतियों और राजनीतिक विमर्श में भी इसका असर दिखाई देता है।