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मुरैना: मध्य प्रदेश के मुरैना से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसमें 26 साल तक चली कानूनी लड़ाई, संत का जीवन और आखिरकार न्याय की जीत देखने को मिली। यह कहानी है मुरैना के गिरवर सिंह तोमर, जो कभी केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) में हवलदार के पद पर तैनात थे। विभागीय विवाद के बाद वर्ष 1999 में उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। इसके बाद उन्होंने हार नहीं मानी और करीब ढाई दशक तक अपनी नौकरी और सम्मान वापस पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ते रहे।
वरिष्ठ अधिकारी से विवाद के बाद हुई थी बर्खास्तगी
गिरवर सिंह तोमर उस समय CRPF में हवलदार के पद पर कार्यरत थे। इसी दौरान उनका एक वरिष्ठ अधिकारी से विवाद हो गया। विवाद के बाद उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई। जांच की प्रक्रिया पूरी होने के बाद वर्ष 1999 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
नौकरी जाने के बाद उनके सामने जिंदगी का नया दौर शुरू हुआ। हालांकि, उन्होंने बर्खास्तगी को अंतिम फैसला मानने के बजाय अदालत का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया।
नौकरी गई तो मुरैना लौटे, फिर बन गए संत
नौकरी से बर्खास्त होने के बाद गिरवर सिंह तोमर अपने गृह क्षेत्र मुरैना वापस लौट आए। लेकिन घर-परिवार में उनका मन नहीं लगा। इसके बाद उन्होंने बारह द्वारी मंदिर में रहकर पूजा-पाठ और सेवा शुरू कर दी।
कुछ समय बाद वे गुफा मंदिर पहुंच गए। यहीं उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह आध्यात्मिक गतिविधियों को समर्पित कर दिया और उन्हें गिरवर दास महाराज के नाम से जाना जाने लगा।
संत बनने के बाद भी उन्होंने अपनी कानूनी लड़ाई नहीं छोड़ी। एक तरफ वह मंदिर में पूजा-पाठ और सेवा करते रहे, वहीं दूसरी तरफ अदालत में अपनी नौकरी वापस पाने के लिए संघर्ष जारी रखा।
26 साल बाद हाईकोर्ट से मिली बड़ी राहत
गिरवर सिंह तोमर ने अपनी बर्खास्तगी के खिलाफ कानूनी लड़ाई जारी रखी। उन्होंने हाईकोर्ट की डबल बेंच में अपील दायर की। मामला लंबे समय तक अदालत में चलता रहा।
आखिरकार अगस्त 2025 में हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया और उन्हें नौकरी देने का आदेश दिया। हालांकि अदालत के आदेश के बावजूद जब उन्हें तत्काल सेवा में वापस नहीं लिया गया तो उन्होंने अपने वकीलों के माध्यम से संबंधित अधिकारियों को नोटिस भेजना शुरू किया।
लंबे इंतजार के बाद अदालत के फैसले ने उनके वर्षों पुराने संघर्ष को नई उम्मीद दी।
20 साल तक मंदिर में करते रहे सेवा
गिरवर दास महाराज ने करीब 20 वर्षों तक मंदिर में सेवा की। नौकरी से दूर रहने के दौरान उनका अधिकांश समय पूजा-पाठ और धार्मिक सेवा में ही बीता।
बताया जाता है कि वह सामान्य दिनों में मंदिर में रहते और केवल अदालत में तारीख पड़ने पर कानूनी कार्यवाही के लिए जाते थे। उनके लिए यह लड़ाई केवल नौकरी पाने की नहीं, बल्कि अपने ऊपर लगे बर्खास्तगी के फैसले को चुनौती देने और अपना पुराना सम्मान वापस पाने की भी थी।
परिवार में भी खुशी का माहौल
गिरवर सिंह तोमर का परिवार भी है। उनके दो बेटे और दो बेटियां हैं। दोनों बेटियों की शादी हो चुकी है। उनका एक बेटा एयरफोर्स में जवान है, जबकि दूसरा बेटा अभी पढ़ाई कर रहा है।
26 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अदालत से मिली जीत से परिवार में खुशी का माहौल है। परिवार के लिए यह पल इसलिए भी खास है क्योंकि इतने लंबे समय तक चले संघर्ष का आखिरकार सकारात्मक परिणाम सामने आया।
फिर पहनी वर्दी, भावुक कर देने वाला पल
कानूनी जीत के बाद गिरवर सिंह तोमर ने बीजापुर में जाकर दोबारा वर्दी पहनी। जिस वर्दी को उन्होंने करीब 26 साल पहले खो दिया था, उसे इतने लंबे संघर्ष के बाद दोबारा पहनना उनके लिए बेहद भावुक पल रहा होगा।
एक तरफ वह वर्षों तक संत के रूप में मंदिर में सेवा करते रहे और दूसरी तरफ उन्होंने अदालत में अपनी लड़ाई जारी रखी। 26 साल बाद वर्दी में लौटने की यह कहानी संघर्ष, धैर्य और न्याय की उम्मीद की मिसाल बन गई है।