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de listing debate intensifies in chhattisgarh
रायपुर। दिल्ली के लालकिला मैदान में आयोजित जनजाति सांस्कृतिक संगम के बाद देशभर सहित छत्तीसगढ़ में भी “डी-लिस्टिंग” को लेकर बहस तेज हो गई है। धर्मांतरण करने वाले आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) की सूची से बाहर करने की मांग को लेकर एक ओर समर्थन बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर इसका विरोध भी खुलकर सामने आने लगा है।
दिल्ली में रविवार को आयोजित कार्यक्रम में देशभर से आदिवासी समाज के लोग जुटे। कार्यक्रम में आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के समर्थन में प्रदर्शन किया गया। इस दौरान धर्मांतरण करने वाले आदिवासियों को एसटी सूची से हटाने तथा संविधान के अनुच्छेद 342 में संशोधन की मांग उठाई गई।
छत्तीसगढ़ से वनवासी सुरक्षा मंच के बैनर तले पूर्व मंत्री गणेशराम भगत और सांसद भोजराम नाग इस मांग का नेतृत्व कर रहे हैं। कार्यक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय, मंत्री रामविचार नेताम समेत कई सांसद और विधायक शामिल हुए।
पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम भी कार्यक्रम में शामिल होने वाले थे, लेकिन अस्वस्थता के कारण नहीं पहुंच सके। उन्होंने कहा कि डी-लिस्टिंग को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर गंभीर तैयारी की गई है और समाज की भावनाओं के अनुरूप यह मांग लगातार मजबूत हो रही है। नेताम का कहना है कि “देर-सबेर डी-लिस्टिंग होकर रहेगी।” उन्होंने यह भी कहा कि धर्मांतरण के मुद्दे पर छत्तीसगढ़ में कड़े कानून की दिशा में भी प्रयास हो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यह एक संवेदनशील विषय है, जो धीरे-धीरे राष्ट्रीय से अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनता जा रहा है, इसलिए सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना पड़ेगा।
वहीं दूसरी तरफ, जशपुर में डी-लिस्टिंग की मांग के विरोध में प्रदर्शन किया गया। पूर्व संसदीय सचिव यूडी मिंज और गीता उरांव ने इसका नेतृत्व किया। यूडी मिंज ने कहा कि डी-लिस्टिंग की मांग संविधान की भावना के विपरीत है और इसे अनावश्यक राजनीतिक रंग दिया जा रहा है।
मिंज ने कहा कि आदिवासी समाज की परंपराएं, रीति-रिवाज और सांस्कृतिक पहचान धर्म परिवर्तन के बावजूद समाप्त नहीं होतीं। उन्होंने कहा कि जशपुर जिले में बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय निवास करता है और समाज की पहचान उसके सांस्कृतिक जीवन से जुड़ी हुई है।
उन्होंने यह भी याद दिलाया कि कांग्रेस सरकार के दौरान रौतिया समेत अन्य समाजों को आदिवासी वर्ग में शामिल करने के लिए टीआरआई के माध्यम से प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा गया था।
डी-लिस्टिंग के मुद्दे पर अब छत्तीसगढ़ में राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज होती नजर आ रही है। आने वाले दिनों में यह विषय प्रदेश की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन सकता है।