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गरियाबंद। छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में सुपेबेड़ा के बाद अब देवभोग से किडनी की बीमारी को लेकर चिंता बढ़ाने वाला मामला सामने आया है। देवभोग के वार्ड क्रमांक-3 में रहने वाले करीब 350 लोगों ने मोहल्ले के बोर का पानी पीना लगभग छोड़ दिया है। स्थानीय लोग पीने के पानी के लिए करीब एक किलोमीटर दूर दूसरे जलस्रोतों का रुख कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि इलाके के बोर के पानी से पेट संबंधी परेशानी होती है और पानी पीने योग्य नहीं लगता।
स्थानीय स्तर पर दावा किया जा रहा है कि पिछले करीब छह वर्षों में देवभोग में 15 लोगों की किडनी की बीमारी से मौत हुई है। इनमें 8 मृतक वार्ड क्रमांक-3 के बताए जा रहे हैं। हालांकि, इन सभी मौतों को किडनी की बीमारी से जोड़ने की सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। यही वजह है कि मामले में विस्तृत स्वास्थ्य और जल जांच की जरूरत महसूस की जा रही है।
50 से ज्यादा बोर के पानी में TDS 800 से 1200 mg/L
ग्रामीणों की शिकायत के बाद PHE विभाग ने इलाके के पानी के नमूनों की जांच कराई। जांच रिपोर्ट में देवभोग के 50 से अधिक बोर कनेक्शनों के पानी में TDS (Total Dissolved Solids) की मात्रा करीब 800 से 1200 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पाई गई।
TDS पानी में घुले हुए कुल ठोस पदार्थों की मात्रा को दर्शाता है। स्थानीय लोगों की चिंता इस बात को लेकर है कि यदि पानी की गुणवत्ता लंबे समय तक खराब बनी रहती है तो इसका स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, इसकी विस्तृत जांच की जानी चाहिए।
वार्ड-3 में कई लोगों की किडनी बीमारी से मौत का दावा
स्थानीय लोगों के मुताबिक वार्ड क्रमांक-3 में किडनी की बीमारी से पीड़ित कई लोगों की मौत पिछले कुछ वर्षों में हुई। इनमें रविशंकर निषाद, चरण निषाद, अभिमन्यु सेन और खीरोबाई ठाकुर की मौत 2019 में होने की बात कही जा रही है।
इसके बाद टीचर खगेश्वर ठाकुर का निधन 2021 में, जबकि रामेश्वर यादव और प्रेमसिंह ठाकुर की मौत 2023 में होने की जानकारी सामने आई है। स्थानीय लोगों का दावा है कि ये सभी किडनी की बीमारी से पीड़ित थे।
हालांकि, इन मौतों की वजह और पानी की गुणवत्ता के बीच सीधा संबंध है या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से मेडिकल रिकॉर्ड, मरीजों की हिस्ट्री और पानी की विस्तृत जांच के आधार पर वैज्ञानिक मूल्यांकन जरूरी होगा।
एक सरकारी कर्मचारी का किडनी ट्रांसप्लांट, अब डायलिसिस पर
वार्ड-3 में रहने वाले एक सरकारी कर्मचारी भी किडनी की बीमारी से जूझ चुके हैं। बताया गया कि उनका किडनी ट्रांसप्लांट हो चुका है। उनकी पत्नी ने उन्हें अपनी एक किडनी दान की थी। फिलहाल वे डायलिसिस के सहारे इलाज करा रहे हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि मोहल्ले में किडनी की बीमारी के कई मामले सामने आने के बाद लोगों में पानी को लेकर डर बढ़ गया है। इसी वजह से अधिकांश परिवार बोर का पानी पीने से बच रहे हैं।
एक किलोमीटर दूर से पानी ला रहे ग्रामीण
वार्ड-3 निवासी भोलेश्वर राजपूत ने बताया कि पीने के पानी के लिए उन्हें करीब एक किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। उनके मुताबिक इलाके में बोर का पानी उपलब्ध है, लेकिन लोग उसे पीने योग्य नहीं मानते। उनका कहना है कि यह पानी पीने के बाद पेट खराब होने की शिकायत होती है।
भोलेश्वर के अनुसार, यही वजह है कि वार्ड के लगभग सभी लोग दूसरे इलाके से पीने का पानी लाकर इस्तेमाल कर रहे हैं।
सोलर पंप बंद, दूसरे जलस्रोत पर निर्भर लोग
स्थानीय निवासी भजन ठाकुर, जिन्होंने किडनी की बीमारी के कारण अपने माता-पिता को खोया है, ने बताया कि मोहल्ले के ज्यादातर लोग वार्ड-3 में लगे सोलर पंप से पानी लाते हैं। बताया जाता है कि इस पंप से मिलने वाले पानी का TDS सामान्य है।
वहीं घनश्याम ठाकुर का कहना है कि वे सुबह परिवार के साथ खेत जाते हैं और वहीं से दिनभर पीने के लिए जरूरी पानी लेकर घर लौटते हैं। यानी पीने के पानी की व्यवस्था के लिए ग्रामीणों को रोजमर्रा की जिंदगी में अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है।
स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि वार्ड में एक अच्छे जलस्रोत पर सोलर सिस्टम लगाया गया था, लेकिन वह लंबे समय से बंद पड़ा है। यदि इसे चालू कर दिया जाए तो लोगों को अपेक्षाकृत बेहतर जलस्रोत उपलब्ध हो सकता है।
ग्रामीणों की मांग- पानी की हो विस्तृत जांच
स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्होंने कई बार इलाके के पानी की विस्तृत जांच कराने की मांग की, लेकिन अब तक उन्हें संतोषजनक स्तर पर डिटेल जांच नहीं मिल पाई है। ग्रामीण चाहते हैं कि सिर्फ TDS ही नहीं, बल्कि पानी में मौजूद अन्य खनिजों और संभावित हानिकारक तत्वों की भी विस्तृत जांच कराई जाए।
साथ ही लोगों की मांग है कि वार्ड में बंद पड़े सोलर सिस्टम को जल्द शुरू किया जाए और सुरक्षित पेयजल की स्थायी व्यवस्था की जाए।
BMO ने माना- ज्यादा TDS वाला पानी परेशानी बढ़ा सकता है
देवभोग के BMO प्रकाश साहू ने बताया कि यदि ज्यादा TDS वाला पानी लंबे समय तक पिया जाए तो स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। उनके मुताबिक इससे पाचन तंत्र और हड्डियों से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।
हालांकि उन्होंने यह भी बताया कि वार्ड-3 की आबादी को देखते हुए फिलहाल जलजनित बीमारी के कोई खास लक्षण सामने नहीं आए हैं। अस्पताल में भी इस तरह की बीमारी के किसी मरीज के पहुंचने की सूचना नहीं है। वार्ड-3 के एक निवासी की स्वास्थ्य संबंधी समस्या का सफल इलाज किए जाने की जानकारी भी उन्होंने दी।
सुपेबेड़ा की वजह से बढ़ी चिंता
गरियाबंद जिले का सुपेबेड़ा इलाका पहले से ही किडनी बीमारी के मामलों को लेकर देशभर में चर्चा में रहा है। ऐसे में देवभोग में किडनी की बीमारी से मौतों के दावे और पानी में TDS की अधिक मात्रा सामने आने के बाद स्थानीय लोगों की चिंता स्वाभाविक रूप से बढ़ गई है।
हालांकि, देवभोग में हुई मौतों और पानी की गुणवत्ता के बीच सीधा कारण-परिणाम संबंध अभी साबित नहीं हुआ है। इसलिए मामले में निष्पक्ष और विस्तृत स्वास्थ्य सर्वे, मृतकों के मेडिकल रिकॉर्ड की समीक्षा तथा पानी की रासायनिक जांच जरूरी है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर वार्ड-3 में किडनी बीमारी के मामले क्यों सामने आ रहे हैं और क्या इसका संबंध स्थानीय पेयजल की गुणवत्ता से है?