

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

jagannath rath yatra phuluri oil tradition puri temple
पुरी। भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा से पहले पुरी में सदियों पुरानी परंपराओं का निर्वहन शुरू हो गया है। इसी कड़ी में बड़ा ओड़िया मठ से 365 दिनों तक जमीन के भीतर सुरक्षित रखे गए विशेष 'फुलुरी तेल' को निकालकर श्रीमंदिर पहुंचाया गया। इस विशेष तेल का उपयोग भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के नेत्रोत्सव, उपचार और श्रृंगार की धार्मिक परंपराओं में किया जाएगा।
जानकारी के अनुसार, आषाढ़ कृष्ण पक्ष की पंचमी के दिन बड़ा ओड़िया मठ में गुप्त स्थान पर मिट्टी में दबाकर रखे गए घड़े को बाहर निकाला गया। इस घड़े में रखा गया विशेष औषधीय एवं सुगंधित फुलुरी तेल पूरे 365 दिनों तक जमीन के भीतर परिपक्व होता है। परंपरा के अनुसार इसके बाद इसे विधि-विधान के साथ श्रीमंदिर भेजा जाता है।
बताया जाता है कि यह विशेष तेल तिल के तेल, चमेली, केवड़ा, चंपा, बकुल, कपूर, चंदन और कई औषधीय जड़ी-बूटियों के मिश्रण से तैयार किया जाता है। मिट्टी के घड़े में सील कर एक वर्ष तक रखने से इसके औषधीय गुण और अधिक प्रभावी हो जाते हैं। मान्यता है कि यह तेल भगवान जगन्नाथ के दिव्य विग्रहों की सुरक्षा के साथ-साथ नमी, कीट और घुन से बचाव में भी सहायक होता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा 'अनवसर काल' में रहते हैं। इस दौरान उन्हें ज्वर आने की मान्यता है और 15 दिनों तक विशेष उपचार किया जाता है। इसी अवधि में फुलुरी तेल से भगवान के विग्रहों की मालिश की जाती है ताकि रथयात्रा से पहले उनका उपचार और श्रृंगार पूर्ण हो सके।
श्रीमंदिर में इन दिनों नेत्रोत्सव और रथयात्रा की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। अनवसर काल के दौरान मुख्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए बंद रहते हैं और भक्तों को भगवान के प्रतीक स्वरूप 'पट्टचित्र' के दर्शन कराए जाते हैं। नेत्रोत्सव के बाद भगवान पहली बार भक्तों को दर्शन देंगे और फिर भव्य रथयात्रा में तीनों देवता अपने-अपने रथों पर विराजमान होकर नगर भ्रमण के लिए निकलेंगे।
भगवान जगन्नाथ की यह अनूठी परंपरा धार्मिक आस्था, आयुर्वेदिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम मानी जाती है, जिसे हर वर्ष विधि-विधान के साथ निभाया जाता है।