

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

pm modi dimaagi naxali statement kiren rijiju clarification controversy
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सली’ शब्द को लेकर शुरू हुआ राजनीतिक विवाद अब और गहरा गया है। विपक्षी नेताओं की आपत्ति के बाद केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री के बयान का संदर्भ स्पष्ट करते हुए कहा है कि यह टिप्पणी संविधान में विश्वास रखने वाले विपक्षी नेताओं या आम नागरिकों के लिए नहीं थी। सरकार के मुताबिक, प्रधानमंत्री का निशाना उन लोगों पर था जो माओवादी हिंसा, अलगाववादी विचारधारा या देश की संवैधानिक व्यवस्था को चुनौती देने वाली गतिविधियों का समर्थन करते हैं।
संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रधानमंत्री के बयान का बचाव करते हुए कहा कि ‘दिमागी नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल उन लोगों के लिए किया गया है जो माओवादियों का समर्थन करते हैं और भारतीय संविधान को स्वीकार नहीं करते। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रधानमंत्री की टिप्पणी को विपक्ष के हर आलोचक या सरकार से सवाल पूछने वाले व्यक्ति पर लागू करना सही नहीं है।
रिजिजू ने बताईं ‘दिमागी नक्सली’ की तीन श्रेणियां
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया के जरिए सरकार का पक्ष रखते हुए बताया कि प्रधानमंत्री के बयान में किन लोगों की ओर संकेत किया गया था। उन्होंने मुख्य रूप से तीन श्रेणियों का उल्लेख किया।
पहली श्रेणी में ऐसे लोग हैं जो माओवादियों का समर्थन करते हैं और भारतीय संविधान को अस्वीकार करते हैं।
दूसरी श्रेणी में वे लोग बताए गए हैं जो अलगाववादी विचारों के साथ खड़े होते हैं और जम्मू-कश्मीर से जुड़े अलगाववादी एजेंडे का समर्थन करते हैं।
तीसरी श्रेणी में ऐसे तत्वों का जिक्र किया गया है जो भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र को देश के बाकी हिस्सों से अलग करने के लिए ‘चिकन नेक’ क्षेत्र को काटने जैसी बातें करते हैं।
रिजिजू का कहना है कि प्रधानमंत्री का बयान उन लोगों को लेकर था जो देश की एकता, अखंडता और संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ खड़े होते हैं।

लाल किले से PM मोदी ने क्या कहा था?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित किया था। अपने भाषण में उन्होंने देश में सशस्त्र नक्सलवाद के खिलाफ हुई कार्रवाई और सफलता का उल्लेख किया।
पीएम मोदी ने कहा कि भारत ने सशस्त्र नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ी है, लेकिन केवल हथियार उठाने वाले नक्सलियों से ही सावधान रहने की जरूरत नहीं है। उन्होंने ऐसे लोगों की ओर भी इशारा किया जो कथित तौर पर नक्सली या वामपंथी उग्रवाद के लिए वैचारिक आधार तैयार करते हैं। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘दिमागी नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल किया।
प्रधानमंत्री ने देशवासियों से ऐसे तत्वों को पहचानने और उनसे सतर्क रहने की अपील की।
‘अर्बन नक्सल’ के बाद ‘दिमागी नक्सली’ पर बहस
प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सली’ वाले बयान के बाद राजनीतिक गलियारों में नई बहस छिड़ गई। इससे पहले भी भारतीय राजनीति में ‘अर्बन नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल होता रहा है। हालांकि, इस बार प्रधानमंत्री द्वारा ‘दिमागी नक्सली’ शब्द के इस्तेमाल ने विपक्ष को सरकार पर हमला करने का नया मुद्दा दे दिया।
विपक्षी नेताओं का आरोप है कि सरकार आलोचना करने वालों और सवाल उठाने वालों को अलग-अलग राजनीतिक लेबल देकर उनकी आवाज दबाने की कोशिश करती है। वहीं, सरकार का कहना है कि लोकतांत्रिक आलोचना और देश विरोधी या हिंसक विचारधाराओं के समर्थन में स्पष्ट अंतर है।
चिदंबरम ने साधा निशाना
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम ने भी प्रधानमंत्री के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अगर संविधान में विश्वास रखना, लोकतंत्र की बात करना और सरकार से सवाल पूछना ‘दिमागी नक्सली’ कहलाने की वजह है, तो उन्हें इस तरह संबोधित किए जाने पर गर्व होगा।
चिदंबरम की टिप्पणी के बाद यह मुद्दा और राजनीतिक हो गया। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने प्रधानमंत्री के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि लोकतंत्र में सरकार से सवाल करना नागरिकों का अधिकार है।
विपक्ष ने पूछा- सवाल करने वाला नक्सली कैसे?
सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास ने भी प्रधानमंत्री के बयान पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि केवल सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने या उसकी आलोचना करने वाले शिक्षित युवाओं को नक्सली की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
विपक्ष का तर्क है कि लोकतंत्र में असहमति और आलोचना को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के साथ जोड़ना उचित नहीं है। सरकार की ओर से हालांकि लगातार यह स्पष्ट किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री का बयान सामान्य राजनीतिक आलोचना करने वालों के लिए नहीं था।
सरकार ने दिया स्पष्टीकरण, लेकिन विवाद बरकरार
सरकार की सफाई के बावजूद ‘दिमागी नक्सली’ शब्द को लेकर राजनीतिक विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। एक तरफ केंद्र सरकार इसे माओवादी हिंसा और अलगाववादी विचारधारा का समर्थन करने वाले तत्वों के संदर्भ में इस्तेमाल किया गया शब्द बता रही है, वहीं विपक्ष इसे व्यापक राजनीतिक असहमति को निशाना बनाने वाली भाषा के तौर पर देख रहा है।
अब इस पूरे विवाद का केंद्र यही सवाल बन गया है कि ‘दिमागी नक्सली’ की परिभाषा किस तरह तय की जाए और लोकतांत्रिक असहमति तथा उग्रवादी विचारधारा के समर्थन के बीच स्पष्ट सीमा कहां खींची जाए।
फिलहाल, सरकार का कहना है कि संविधान और लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले आम नागरिक या विपक्षी नेता प्रधानमंत्री के बयान के निशाने पर नहीं थे। वहीं विपक्ष इस स्पष्टीकरण के बावजूद प्रधानमंत्री के शब्दों को लेकर सवाल उठा रहा है। ऐसे में स्वतंत्रता दिवस के भाषण का यह हिस्सा आने वाले दिनों में भी राजनीतिक बहस का बड़ा मुद्दा बना रह सकता है।