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नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ में पुलिस हिरासत में हुई एक व्यक्ति की मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य पुलिस की कार्यप्रणाली पर बेहद कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने FIR दर्ज करने में हुई देरी, जांच के तरीके और राज्य पुलिस के रवैये पर गंभीर सवाल उठाते हुए छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक (DGP) अरुण देव गौतम को लेकर बेहद तीखी टिप्पणी की। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि उसे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि छत्तीसगढ़ के DGP ‘‘पूरी तरह से अयोग्य’’ हैं।
यह मामला बिलासपुर जिले के सीपत थाना क्षेत्र का है, जहां जनवरी 2024 में 34 वर्षीय श्रवण सूर्यवंशी की गिरफ्तारी के कुछ दिनों बाद मौत हो गई थी। मृतक की पत्नी और दो बेटियों ने आरोप लगाया है कि पुलिस हिरासत में उनके पति और पिता के साथ कथित तौर पर मारपीट और प्रताड़ना की गई, जिसके कारण उनकी मौत हुई।
मामले की सुनवाई जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ कर रही है।
शराब बेचने के आरोप में हुई थी गिरफ्तारी
मामला 18 जनवरी 2024 का है। जानकारी के मुताबिक, बिलासपुर जिले की सीपत पुलिस ने श्रवण सूर्यवंशी को आबकारी अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया था। आरोप था कि वह अपनी किराना दुकान के सामने करीब 1,200 रुपये की कच्ची महुआ शराब बेच रहा था।
गिरफ्तारी के बाद श्रवण को केंद्रीय जेल बिलासपुर भेज दिया गया। इसके तीन दिन बाद, 21 जनवरी को उसकी तबीयत बिगड़ गई। उसे इलाज के लिए सिम्स अस्पताल बिलासपुर में भर्ती कराया गया, जहां 22 जनवरी की सुबह उसकी मौत हो गई।
परिवार का आरोप है कि हिरासत के दौरान श्रवण को प्रताड़ित किया गया था और उसके साथ मारपीट की गई थी। इसी वजह से उसकी मौत होने का दावा करते हुए परिजनों ने निष्पक्ष जांच और उचित मुआवजे की मांग की।
ढाई साल बाद दर्ज हुई FIR, सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल FIR दर्ज करने में हुई देरी को लेकर उठा है। आरोप है कि जनवरी 2024 में हुई हिरासत में मौत के बावजूद पुलिस ने करीब ढाई साल तक FIR दर्ज नहीं की।
बताया गया कि 30 जुलाई 2026 को इस मामले में FIR दर्ज की गई। FIR में हुई इस देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए।
अदालत ने यह जानना चाहा कि जब घटना जनवरी 2024 की थी, तो कार्रवाई के लिए जुलाई 2026 तक इंतजार क्यों किया गया।
हाईकोर्ट ने दिया था सिर्फ 1 लाख रुपये मुआवजा
श्रवण सूर्यवंशी की पत्नी और दो बेटियों ने पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। परिवार की ओर से मामले की निष्पक्ष जांच कराने और 50 लाख रुपये मुआवजा दिए जाने की मांग की गई थी।
हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले में जांच के निर्देश दिए बिना परिवार को 1 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया था।
इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही सुनवाई के दौरान 1 लाख रुपये के मुआवजे को ‘‘पूरी तरह अपर्याप्त’’ बताया था और कहा था कि यह राशि परिवार को हुए नुकसान के अनुरूप नहीं है।
DGP और गृह सचिव को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से पेश होने का आदेश
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के गृह सचिव और DGP को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से अदालत के सामने पेश होने का निर्देश दिया था।
सुनवाई के दौरान DGP अरुण देव गौतम ने अदालत को बताया कि मामले की जांच के आदेश दे दिए गए हैं और यदि कोई अधिकारी दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।
हालांकि, DGP का यह जवाब सुप्रीम कोर्ट को संतुष्ट नहीं कर सका।
FIR में देरी पर DGP के जवाब से कोर्ट नाराज
सुनवाई के दौरान FIR दर्ज करने में हुई देरी का कारण बताते हुए DGP ने कहा कि न्यायिक जांच की रिपोर्ट समय पर उपलब्ध नहीं हो सकी थी। इसी वजह से FIR दर्ज करने में देरी हुई।
इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि जिस न्यायिक जांच रिपोर्ट के उपलब्ध नहीं होने की बात कही जा रही है, वही रिपोर्ट राज्य सरकार के हलफनामे के साथ पहले से हाईकोर्ट के रिकॉर्ड पर मौजूद थी।
अदालत ने इस स्थिति पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ‘‘हर पहलू पर कोर्ट को गुमराह किया जा रहा है।’’
‘सिर पर कुंद हथियार से चोट’ को लेकर कोर्ट ने पूछा सवाल
सुनवाई के दौरान DGP की ओर से यह भी कहा गया कि उपलब्ध रिपोर्ट के आधार पर कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता।
इस दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर सवाल उठाया। जस्टिस संदीप मेहता ने पूछा कि अगर किसी व्यक्ति की मौत सिर पर कुंद हथियार से लगी चोट के कारण हुई है तो इसका क्या मतलब है।
अदालत ने इस बिंदु को बेहद गंभीर माना और पुलिस की जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
इसके बाद पीठ ने छत्तीसगढ़ के DGP को लेकर बेहद कड़ी टिप्पणी की और कहा कि उसे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि राज्य के DGP ‘‘पूरी तरह से अयोग्य’’ हैं।
न्यायिक जांच में सामने आई थी सिर पर चोट की बात
राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में दावा किया था कि श्रवण की गिरफ्तारी के समय उसका मेडिकल परीक्षण कराया गया था और उस समय उसके शरीर पर कोई गंभीर चोट नहीं मिली थी।
हालांकि, बाद में दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 176 के तहत हुई न्यायिक जांच में मौत को लेकर अलग तथ्य सामने आया। न्यायिक जांच में यह निष्कर्ष सामने आया कि श्रवण की मौत सिर पर कुंद हथियार से लगी चोट के कारण हुई जटिलताओं से हुई थी।
यही बिंदु सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में भी महत्वपूर्ण रहा।
स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने के संकेत
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह भी संकेत दिया कि अगर राज्य पुलिस निष्पक्ष और प्रभावी जांच करने में सक्षम नहीं दिखाई देती है, तो जांच किसी दूसरी एजेंसी को सौंपी जा सकती है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि अब यह तय करना होगा कि मामले में जिम्मेदारी तय करने और जांच करने का काम राज्य पुलिस को ही दिया जाए या फिर किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए।
मामले में अदालत की टिप्पणियों से साफ है कि सुप्रीम कोर्ट पुलिस हिरासत में हुई मौत और उसके बाद की जांच को बेहद गंभीरता से देख रहा है।
परिवार को अब निष्पक्ष जांच की उम्मीद
श्रवण सूर्यवंशी की पत्नी और उनकी दो बेटियों का कहना है कि उन्हें अब सुप्रीम कोर्ट से निष्पक्ष जांच और न्याय की उम्मीद है। परिवार का आरोप है कि हिरासत में श्रवण के साथ प्रताड़ना हुई और इसी कारण उनकी जान गई।
वहीं, राज्य पुलिस की ओर से अब तक अदालत के समक्ष जांच के आदेश दिए जाने और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का आश्वासन दिया गया है।
अब इस मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि जांच की जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ पुलिस के पास रहेगी या सुप्रीम कोर्ट किसी स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने का निर्देश देगा। साथ ही, अदालत की अगली सुनवाई में FIR में हुई देरी और न्यायिक जांच में सामने आए निष्कर्षों पर भी महत्वपूर्ण निर्देश आने की संभावना है।