

Copyright © 2026 rights reserved by Inkquest Media
अन्य समाचार

supreme court compassionate appointment not a fundamental right
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति (Compassionate Appointment) किसी व्यक्ति का मौलिक या कानूनी अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा कि यह केवल मृतक सरकारी कर्मचारी के परिवार की तत्काल आर्थिक सहायता के लिए बनाई गई विशेष व्यवस्था है, इसलिए इसका लाभ केवल निर्धारित नियमों और शर्तों के अनुसार ही दिया जा सकता है।
यह फैसला छत्तीसगढ़ के रायपुर निवासी अंकित कुमार नाविक की याचिका पर सुनाया गया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज कर दी।
मामले के अनुसार, अंकित कुमार के पिता स्वर्गीय हबीबुल्लाह नाविक राज्य मानसिक चिकित्सालय में सामुदायिक सेवा से जुड़े पद पर कार्यरत थे। वर्ष 2011 में उनके निधन के बाद परिवार को पेंशन सहित अन्य सेवा लाभ मिल गए थे। उस समय अंकित नाबालिग थे, इसलिए उनकी मां ने निर्धारित समय सीमा के भीतर अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन नहीं किया।
बालिग होने के बाद अंकित ने 20 जनवरी 2015 को अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, लेकिन विभाग ने इसे समय सीमा समाप्त होने के आधार पर खारिज कर दिया। इसके खिलाफ उन्होंने पहले हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृतक कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक संकट से उबारना है। यदि वर्षों बाद आवेदन किया जाता है, तो योजना का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। अदालत ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति को सामान्य भर्ती प्रक्रिया का विकल्प नहीं बनाया जा सकता और इसे केवल निर्धारित नियमों के दायरे में ही दिया जा सकता है।
इस फैसले के साथ सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए अंकित कुमार की विशेष अनुमति याचिका को खारिज कर दिया। यह निर्णय भविष्य में अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है।