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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया है कि वह अपने कर्मचारियों को 2009 से 2019 तक का बकाया महंगाई भत्ता (DA) समय पर भुगतान करे। जस्टिस संजय करोल और पी.के. मिश्रा की बेंच ने इसे कर्मचारियों का वैधानिक अधिकार करार देते हुए कहा कि ROPA नियमों के तहत उपलब्धियों की गणना के लिए DA अनिवार्य है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्य की वित्तीय क्षमता बकाया भत्ते से इनकार करने का कोई वैध आधार नहीं बन सकती।
सुप्रीम कोर्ट ने बकाया भुगतान की प्रक्रिया और किस्तों को तय करने के लिए एक विशेष समिति का गठन किया है, जिसकी अध्यक्षता पूर्व जस्टिस इंदु मल्होत्रा कर रही हैं। इस समिति में जस्टिस तरलोचन सिंह चौहान, जस्टिस गौतम विधूड़ी और CAG के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार, राज्य सरकार को 6 मार्च 2026 तक कुल बकाया का 25% हिस्सा तुरंत भुगतान करना होगा। बाकी राशि किस्तों में कैसे दी जाएगी, यह समिति तय करेगी और अपनी विस्तृत रिपोर्ट 16 मई 2026 तक सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी।
सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार ने वित्तीय तंगी का हवाला दिया था। कोर्ट ने इसे पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि एक बार अधिकार मिलने के बाद वित्तीय नीति बाधा नहीं बन सकती।
बेंच ने यह भी कहा कि राज्य सरकार द्वारा DA नियमों में किए गए बदलाव “मनमाना और सनकी” थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि साल में दो बार DA नहीं दिया जा सकता और इसे मौलिक अधिकार मानने का सवाल भविष्य के लिए सुरक्षित रखा गया है।
इस फैसले से पश्चिम बंगाल के 20 लाख से अधिक कर्मचारियों को सीधी राहत मिली है। राज्य सरकार के अनुमान के मुताबिक, इस आदेश के बाद उसे लगभग ₹43,000 करोड़ का भुगतान करना होगा।
कलकत्ता हाईकोर्ट ने मई 2022 में तीन महीने के भीतर भुगतान का आदेश दिया था, जिसे राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश को बरकरार रखते हुए 25% राशि का तत्काल भुगतान 6 मार्च तक पूरा करने का निर्देश दिया है।