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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में इस बार रिकॉर्ड मतदान ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दे दी है। दूसरे चरण में 142 सीटों पर मतदान पूरा होने के बाद चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 92.6% वोटिंग दर्ज की गई, जबकि पहले चरण की 152 सीटों पर 93.2% मतदान हुआ था। कुल मिलाकर राज्य के 6.81 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 6.31 करोड़ लोगों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया, जिससे ओवरऑल मतदान प्रतिशत 92.5% से अधिक पहुंच गया। यह पश्चिम बंगाल के चुनावी इतिहास का अब तक का सबसे बड़ा वोटर टर्नआउट माना जा रहा है। तुलना करें तो 2021 के विधानसभा चुनाव में राज्य में करीब 82% मतदान हुआ था।
इतने बड़े मतदान प्रतिशत ने राजनीतिक दलों से लेकर चुनाव विश्लेषकों तक सभी को चौंका दिया है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर इस बार इतनी बड़ी संख्या में मतदाता मतदान केंद्रों तक क्यों पहुंचे। इसके पीछे कई राजनीतिक और सामाजिक कारण सामने आ रहे हैं।
SIR के बाद घटे वोटर्स, लेकिन बढ़ गया मतदान प्रतिशत
चुनाव से पहले विशेष पुनरीक्षण अभियान (SIR) के तहत करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए। इसके बाद राज्य में रजिस्टर्ड वोटर्स की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.75 करोड़ रह गई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुल वोटर्स की संख्या घटने के कारण मतदान प्रतिशत स्वतः बढ़ा हुआ दिखाई दे रहा है।
सरल भाषा में समझें तो अगर किसी क्षेत्र में पहले 100 मतदाता थे और उनमें से 80 वोट डालते थे तो मतदान प्रतिशत 80% होता था। लेकिन यदि पुनरीक्षण के बाद 12 नाम हट जाएं और कुल मतदाता 88 रह जाएं, जबकि वोट डालने वाले 80 ही हों, तो मतदान प्रतिशत बढ़कर 90% से अधिक पहुंच जाएगा। यही स्थिति इस बार बंगाल में भी देखने को मिली।
SIR के विरोध में वोटिंग को बना दिया जवाब
राज्य के 23 जिलों में चुनाव हुए, जिनमें से 19 जिलों में 90% से ज्यादा मतदान हुआ। जिन जिलों में सबसे अधिक नाम काटे गए थे, वहां भी भारी वोटिंग हुई। मुर्शिदाबाद में 4.55 लाख, उत्तर 24 परगना में 3.25 लाख और मालदा में 2.39 लाख नाम हटाए गए थे। इसके बावजूद इन क्षेत्रों में रिकॉर्ड मतदान दर्ज किया गया।
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि कई मतदाताओं ने SIR के विरोध में लोकतांत्रिक तरीके से जवाब देने के लिए मतदान किया। लोगों को लगा कि अगर वे मतदान नहीं करेंगे तो भविष्य में उनकी पहचान और अधिकार दोनों पर असर पड़ सकता है।
29 लाख प्रवासी मजदूर लौटे बंगाल
रिकॉर्ड मतदान की दूसरी बड़ी वजह प्रवासी मजदूरों की वापसी मानी जा रही है। प्रवासी श्रमिक कल्याण बोर्ड के अनुसार करीब 29 लाख प्रवासी मजदूर चुनाव के दौरान बंगाल लौटे। इनमें बड़ी संख्या उन मजदूरों की थी जो दूसरे राज्यों में काम कर रहे थे लेकिन वोट डालने के लिए अपने गृह जिलों में पहुंचे।
सूत्रों के अनुसार विभिन्न राजनीतिक दलों ने प्रवासियों की वापसी के लिए विशेष इंतजाम किए। कई राज्यों से ट्रेनें और सैकड़ों बसें चलाई गईं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मतदाता सूची से नाम कटने के डर ने भी प्रवासी मजदूरों को मतदान के लिए प्रेरित किया।
महिलाओं को साधने की रणनीति रही असरदार
इस चुनाव में महिला मतदाता भी निर्णायक भूमिका में नजर आईं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने लक्ष्मीर भंडार योजना की राशि बढ़ाने का वादा किया। इस योजना से लगभग 2.4 करोड़ महिलाओं को लाभ मिलता है। वहीं महिला सुरक्षा के लिए पिंक बूथ और विशेष पेट्रोलिंग का भी वादा किया गया।
दूसरी ओर बीजेपी ने महिलाओं के लिए अन्नपूर्णा भंडार योजना के तहत हर महीने 3000 रुपए देने, सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा और सरकारी नौकरियों में 33% आरक्षण का वादा किया।
पिछले कुछ वर्षों में महिला मतदाताओं का झुकाव उन दलों की ओर बढ़ा है जो सीधे आर्थिक लाभ देने वाली योजनाएं लाते हैं। यही वजह रही कि इस बार महिला वोटर्स बड़ी संख्या में मतदान केंद्रों तक पहुंचीं।
बीजेपी और TMC दोनों ने झोंकी पूरी ताकत
इस चुनाव को बीजेपी और तृणमूल कांग्रेस दोनों ने प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया। बीजेपी जहां बंगाल में सत्ता परिवर्तन चाहती है, वहीं TMC अपनी पकड़ बरकरार रखने की कोशिश में जुटी है।
बीजेपी की ओर से केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने चुनाव की कमान संभाली। बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय किया गया। दूसरी ओर TMC की तरफ से ममता बनर्जी, अभिषेक बनर्जी और कई वरिष्ठ नेता लगातार जमीनी स्तर पर सक्रिय रहे।
विशेषज्ञों के मुताबिक जब मुकाबला कड़ा होता है, तब मतदाता ज्यादा संख्या में मतदान करने निकलते हैं। बंगाल में भी यही असर दिखाई दिया।
इनकमबेंसी फैक्टर भी बना वजह
ममता बनर्जी 2011 से लगातार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं। लंबे समय तक एक ही सरकार रहने पर एंटी-इनकमबेंसी और प्रो-इनकमबेंसी दोनों तरह के भाव पैदा होते हैं।
एक ओर बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों पर असंतोष देखने को मिला, वहीं दूसरी ओर बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता भी सामने आए जो ममता सरकार को एक और मौका देना चाहते हैं। इसी कारण समर्थक और विरोधी दोनों ही पक्षों के मतदाता बड़ी संख्या में घरों से निकले।
भारी सुरक्षा ने बढ़ाया भरोसा
पश्चिम बंगाल लंबे समय से चुनावी हिंसा के लिए चर्चित रहा है। 2021 चुनाव में सैकड़ों हिंसक घटनाएं दर्ज हुई थीं। इसे देखते हुए इस बार केंद्रीय सुरक्षा बलों की 2450 कंपनियां तैनात की गईं। यानी करीब 2.4 लाख जवानों ने चुनावी सुरक्षा संभाली।
करीब हर 150 मतदाताओं पर एक सुरक्षा कर्मी तैनात किया गया। इससे मतदाताओं में भरोसा बढ़ा और लोग बिना डर के मतदान केंद्रों तक पहुंचे।
मतदान प्रतिशत और नतीजों का सीधा संबंध नहीं
हालांकि रिकॉर्ड मतदान ने राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा दी है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ज्यादा मतदान का मतलब हमेशा सत्ता परिवर्तन नहीं होता। कई बार यह मौजूदा सरकार के समर्थन का संकेत भी हो सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि यह रिकॉर्ड मतदान किसके पक्ष में जाएगा, ममता बनर्जी की सत्ता बरकरार रहेगी या बीजेपी पहली बार बंगाल में सरकार बनाएगी। इसका जवाब नतीजों के दिन ही साफ होगा।