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नई दिल्ली। लोकसभा में महिला आरक्षण से जुड़े संविधान (131वां) संशोधन विधेयक, 2026 पर लंबी चर्चा के बाद शुक्रवार को मतदान कराया गया, लेकिन सरकार को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल सका। इसके चलते यह महत्वपूर्ण विधेयक लोकसभा में पारित नहीं हो पाया।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन को बताया कि विधेयक पर विचार के लिए कराए गए मतदान में पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विरोध में 230 वोट डाले गए। सदन में कुल 489 सांसदों ने मतदान किया। चूंकि यह एक संवैधानिक संशोधन विधेयक था, इसलिए इसे पारित करने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई समर्थन जरूरी था। इस हिसाब से विधेयक को पास होने के लिए 326 मतों की आवश्यकता थी, लेकिन सरकार 28 वोट से पीछे रह गई।
21 घंटे तक चली बहस
महिला आरक्षण विधेयक को लेकर लोकसभा में करीब 21 घंटे तक चर्चा चली। इस दौरान 130 सांसदों ने अपनी बात रखी, जिनमें 56 महिला सांसद भी शामिल थीं। बहस के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक भी देखने को मिली।
चर्चा का जवाब देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि यदि विपक्ष इस विधेयक का समर्थन नहीं करेगा तो देश की महिलाओं को यह पता चल जाएगा कि उनके अधिकारों के रास्ते में कौन खड़ा है। उन्होंने कहा कि देश की महिलाएं देख रही हैं कि कौन महिला आरक्षण के समर्थन में है और कौन विरोध में।
सरकार ने दो अन्य विधेयकों पर चर्चा टाली
विधेयक गिरने के बाद संसदीय कार्य राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने सदन में घोषणा की कि इससे जुड़े परिसीमन विधेयक, 2026 और संघ राज्य विधि (संशोधन) विधेयक, 2026 पर अब आगे चर्चा नहीं कराई जाएगी। उन्होंने कहा कि सरकार महिलाओं को उनका अधिकार दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है और भविष्य में इस दिशा में कदम उठाएगी।
इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ने सदन की कार्यवाही शनिवार सुबह 11 बजे तक स्थगित कर दी।
क्या था विधेयक में प्रावधान
संविधान (131वां) संशोधन विधेयक में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान रखा गया था।
विधेयक के अनुसार:
2011 की जनगणना के आधार पर नए परिसीमन के बाद इसे लागू किया जाना था।
2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण कानून लागू करने की योजना थी।
लोकसभा की कुल सीटें 543 से बढ़ाकर अधिकतम 850 तक की जा सकती थीं।
राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं में भी महिलाओं के आरक्षण को समायोजित करने के लिए सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव था।
विपक्ष ने बताया चुनावी ढांचे में बदलाव की कोशिश
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने विधेयक गिरने के बाद कहा कि यह सिर्फ महिला आरक्षण का मुद्दा नहीं था, बल्कि चुनावी व्यवस्था को बदलने की कोशिश थी। उन्होंने आरोप लगाया कि यह संविधान की मूल भावना पर हमला था और विपक्ष ने मिलकर इसे रोक दिया।
राहुल गांधी ने कहा कि महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए, लेकिन इसके नाम पर लोकतांत्रिक संरचना में बदलाव स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक झटका
पिछले 11 वर्षों में यह पहला अवसर माना जा रहा है जब केंद्र सरकार लोकसभा में कोई महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने में असफल रही। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर विधेयक का गिरना सरकार के लिए बड़ा राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।
अब यह देखना होगा कि सरकार महिला आरक्षण के मुद्दे को नए स्वरूप में दोबारा संसद में लाती है या नहीं।
संशोधन विधेयक गिर गया। उन्होंने महिलाओं के नाम पर, संविधान को तोड़ने के लिए, असंवैधानिक तरकीब का इस्तेमाल किया। भारत ने देख लिया। INDIA ने रोक दिया। जय संविधान।