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A major revelation about the US-Iran deal! A ₹25 lakh crore fund could change the landscape, but one issue remains unresolved.
वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से जारी तनाव को कम करने की दिशा में एक अहम कूटनीतिक पहल सामने आई है। दोनों देशों के बीच प्रस्तावित 60 दिन के युद्धविराम समझौते को लेकर नए ड्राफ्ट मेमोरेंडम पर बातचीत जारी है। इस मसौदे में ईरान के लिए 300 अरब डॉलर (करीब 25 लाख करोड़ रुपये) के पुनर्निर्माण निवेश पैकेज और अमेरिकी कंपनियों की भागीदारी जैसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव शामिल किए गए हैं।
पहले चरण में युद्धविराम और समुद्री व्यापार पर जोर
प्रस्तावित समझौते का शुरुआती फोकस सैन्य तनाव कम करने, युद्धविराम लागू करने और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की सामान्य आवाजाही बहाल करने पर है। परमाणु कार्यक्रम जैसे जटिल और विवादित मुद्दों को फिलहाल अगले दौर की वार्ता के लिए सुरक्षित रखा गया है।
होर्मुज खोलने के बदले नाकेबंदी में ढील का प्रस्ताव
समझौते के तहत ईरान समुद्री मार्गों से बाधाएं हटाने और जहाजों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने पर सहमत हो सकता है। इसके बदले अमेरिका फारस की खाड़ी क्षेत्र में अपनी नौसैनिक नाकेबंदी को चरणबद्ध तरीके से कम करने पर विचार कर रहा है।
हालांकि इस प्रक्रिया की समयसीमा को लेकर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं। ईरान चाहता है कि प्रतिबंध और नाकेबंदी तेजी से हटाई जाए, जबकि अमेरिका इसे जमीन पर हालात सामान्य होने से जोड़कर देख रहा है।
300 अरब डॉलर का फंड क्या है?
प्रस्तावित पुनर्निर्माण फंड सीधे ईरान को नकद सहायता देने की योजना नहीं है। इसके तहत अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और कंपनियों को ईरान के तेल, गैस, ऊर्जा, आधारभूत संरचना और रियल एस्टेट क्षेत्रों में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। इस पहल का उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करना और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा देना बताया जा रहा है।
विदेशों में फंसी 24 अरब डॉलर की राशि भी चर्चा में
बातचीत में ईरान की विदेशों में अटकी लगभग 24 अरब डॉलर की संपत्ति का मुद्दा भी शामिल है। प्रस्ताव के अनुसार इस धनराशि को कतर जैसे तीसरे देशों के माध्यम से चरणबद्ध तरीके से जारी किया जा सकता है। अमेरिका सीधे भुगतान की बजाय नियंत्रित और निगरानी वाले तंत्र को प्राथमिकता दे रहा है।
परमाणु कार्यक्रम बना सबसे बड़ा विवाद
वार्ता में सबसे जटिल मुद्दा ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार का है। ईरान चाहता है कि यूरेनियम का एक हिस्सा अंतरराष्ट्रीय निगरानी में देश के भीतर कम संवर्धित किया जाए और शेष सामग्री किसी तीसरे देश को भेजी जाए। अमेरिका अभी इस प्रस्ताव पर पूरी तरह सहमत नहीं दिख रहा है।
इसके अलावा भविष्य में होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर संभावित सर्विस शुल्क को लेकर भी मतभेद बने हुए हैं। ईरान और ओमान शुल्क व्यवस्था के पक्ष में हैं, जबकि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर किसी भी प्रकार के अतिरिक्त शुल्क का विरोध कर रहा है।
ट्रम्प का दावा- ईरान परमाणु बम नहीं बनाएगा
इस बीच डोनाल्ड ट्रम्पने सोशल मीडिया पर दावा किया है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा और होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक जहाजरानी के लिए पूरी तरह खुला रहेगा। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अमेरिकी प्रशासन जल्द ही समझौते को लेकर अंतिम निर्णय ले सकता है।
अंतिम मंजूरी पर बनी हुई है नजर
हालांकि बातचीत में कई बिंदुओं पर प्रगति हुई है, लेकिन आर्थिक प्रतिबंधों में राहत, यूरेनियम भंडारण और सुरक्षा संबंधी अंतिम मंजूरी जैसे मुद्दे अब भी अनसुलझे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों पक्ष इन विवादित बिंदुओं पर सहमति बना लेते हैं, तो यह समझौता पश्चिम एशिया में स्थिरता की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है।